कटिहार में बाढ़ ने बदली खेती की तस्वीर, कलाई छोड़ 100 एकड़ में मिश्रीकंद उगा रहे किसान, अब मुनाफे की उम्मीद
बाढ़ के कारण कटिहार के अमदाबाद दियारा क्षेत्र में पारंपरिक कलाई की खेती प्रभावित हुई है, जिससे किसानों ने मिश्रीकंद ...और पढ़ें

कटिहार के अमदाबाद स्थित गदाई दियारा में मिश्रीकंद की खेती।
HighLights
बाढ़ से कलाई की पारंपरिक खेती हुई प्रभावित।
किसानों ने 100 एकड़ में मिश्रीकंद उगाया।
मिश्रीकंद से प्रति बीघा 40 हजार तक मुनाफा।
संवाद सूत्र, अमदाबाद (कटिहार)। कटिहार जिले के अमदाबाद प्रखंड अंतर्गत दियारा क्षेत्रों में इस वर्ष बाढ़ का प्रकोप लंबा खिंचने के कारण पारंपरिक खेती का समीकरण पूरी तरह बदल गया है।
गदाई दियारा क्षेत्र में बाढ़ का पानी लंबे समय तक टिके रहने के कारण मुख्य फसल 'कलाई' की बुआई का उपयुक्त समय निकल गया। ऐसे में किसानों ने हाथ पर हाथ धरे बैठने के बजाय एक शानदार वैकल्पिक फसल के रूप में मिश्रीकंद (Sweet Potato / Yam variety) की खेती को प्राथमिकता दी है, जिससे किसानों के चेहरे पर अब राहत और उम्मीद की चमक दिखाई दे रही है।
कलाई की खेती पिछड़ी तो किसानों ने अपनाया मिश्रीकंद
चौकिया पहाड़पुर पंचायत के गंगा नदी पार स्थित गदाई दियारा में अमूमन बड़े पैमाने पर कलाई की खेती की जाती है। इस क्षेत्र में कलाई को किसानों का 'काला सोना' कहा जाता है, जो उनकी आर्थिक रीढ़ है।
लेकिन इस बार समय पर बाढ़ का पानी नहीं उतरने के कारण कलाई की बुआई पिछड़ गई। देर से बुआई करने पर उपज में भारी कमी आने की आशंका थी, जिसे भांपते हुए किसानों ने जोखिम से बचने के लिए मिश्रीकंद की खेती का समझदारी भरा विकल्प चुना। वर्तमान में इस इलाके में करीब 100 एकड़ भूमि पर मिश्रीकंद की फसल लगाई गई है।
लागत, पैदावार और बंपर मुनाफे का गणित
अनुभवी स्थानीय किसान विजय सिंह, कुनकुन चौधरी, विनय मंडल और शिवा चौधरी ने बताया कि वे पहले से भी मिश्रीकंद की खेती करते आ रहे हैं, लेकिन इस बार कई अन्य किसानों ने भी भारी नुकसान से बचने के लिए इसे अपनाया है।
बीज और बुआई: किसान समस्तीपुर के ढोली, पूसा रोड तथा मुजफ्फरपुर और वैशाली जिलों से लगभग 2,000 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से उच्च क्वालिटी के उन्नत बीज मंगाते हैं। एक बीघा खेत में लगभग 20 किलो बीज की आवश्यकता होती है।
लागत और उपज: खाद, जुताई, मजदूरी और बीज का खर्च मिलाकर प्रति बीघा लगभग 35 हजार रुपये की कुल लागत आती है। एक बीघा खेत में औसतन 40 से 50 क्विंटल तक मिश्रीकंद की उपज होती है।
आमदनी की उम्मीद: बाजार में लगभग 2,000 रुपये प्रति क्विंटल की दर मिलने पर किसानों को लागत की राशि निकालकर प्रति बीघा 30 से 40 हजार रुपये तक की शुद्ध आमदनी होने की पूरी उम्मीद है।
मिश्रीकंद की इस वैकल्पिक खेती ने न केवल बाढ़ की मार से जूझ रहे दियारा के किसानों को आर्थिक संबल दिया है, बल्कि कृषि विविधीकरण की एक बेहतरीन मिसाल भी पेश की है।
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