आज सर्वपितृ अमावस्या: पितरों की मृत्यु तिथि याद न हो तो ऐसे करें श्राद्ध, मिलेगा भरपूर आशीर्वाद
सर्वपितृ अमावस्या आज मनाई जाएगी, जो 16 दिवसीय पितृपक्ष का समापन करेगी। इस दिन पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और ...और पढ़ें

आज सर्वपितृ अमावस्या: पितरों की मृत्यु तिथि याद न हो तो ऐसे करें श्राद्ध, मिलेगा भरपूर आशीर्वाद (AI Generated Image)
HighLights
सर्वपितृ अमावस्या आज, 16 दिवसीय पितृपक्ष का समापन।
पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व।
अज्ञात तिथि वाले भी इस दिन कर सकते हैं पितरों का श्राद्ध।
जागरण संवाददाता, भभुआ। पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण का महापर्व सर्वपितृ अमावस्या शनिवार को मनाई जाएगी। इसी के साथ 16 दिनों तक चलने वाले पितृपक्ष का समापन होगा। हिंदू धर्म में इस दिन का विशेष महत्व माना गया है।
मान्यता है कि सर्वपितृ अमावस्या पर पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य करने से पितरों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है तथा परिवार के सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
खास बात यह है कि जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि की जानकारी नहीं है या किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं कर पाए हैं, वे भी इस दिन अपने पितरों का श्राद्ध कर सकते हैं।
पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर, शनिवार को है। अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर की रात 9 बजकर 35 मिनट से शुरू होकर 10 अक्टूबर की रात 9 बजकर 19 मिनट तक रहेगी।
पितृपक्ष को सनातन परंपरा में पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का समय माना जाता है। इस दौरान परिवार के लोग अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और अन्य पूर्वजों को याद करते हैं।
पितृपक्ष की अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या, महालया अमावस्या और पितृ विसर्जन अमावस्या भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन सभी ज्ञात और अज्ञात पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध किया जा सकता है।
सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रद्धालु सुबह स्नान कर पुरोहित के निर्देश के अनुसार पितरों का स्मरण कर तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करते हैं। तर्पण में जल के साथ तिल आदि अर्पित कर पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है। कई परिवारों में चावल, तिल और अन्य पारंपरिक सामग्रियों से पिंडदान किया जाता है।
श्राद्ध के बाद ब्राह्मणों अथवा जरूरतमंद लोगों को भोजन कराने और अन्न, वस्त्र तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करने की परंपरा है।
कई घरों में पितरों के निमित्त भोजन निकालकर गाय, कौआ और अन्य जीवों को भी भोजन कराया जाता है। इन कार्यों का उद्देश्य पूर्वजों के प्रति सम्मान जताना, जरूरतमंदों की सहायता करना और सेवा-दान की भावना को बढ़ावा देना है।
