यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 03, 2020 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
पर्यावरण के लिए संजीवनी है देव वृक्ष, हमारी आस्था का केंद्र भी
पीपल बरगद पाकड़ आंवला व नीम आदि को देव वृक्ष के श्रेणी में रखा गया है। बिहार में कैम

पीपल , बरगद, पाकड़, आंवला व नीम आदि को देव वृक्ष के श्रेणी में रखा गया है। बिहार में कैमूर की मिट्टी भी इसके लिए अच्छी है। इन वृक्षों से अन्य पेड़ों के अपेक्षा ऑकसीजन की आपूर्ति भी अधिक मात्रा में होती है। इसी के आधार पर ये पूज्य हुए और हमारी आस्था का सु²ढ़ हुई। लेकिन विकास की दौड़ में वृक्षों की अनदेखी होनी लगी। जिसका समय समय पर उसका खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। समय समय पर प्रदूषण चरम पर पहुंचता है तो वन विभाग के साथ साथ सभी लोगों को देव वृक्ष या यूं कहें तो फाइकस प्राजाति के पौधों की याद आने लगती है। ग्लोबल वार्मिंग भी इसका ही एक उदाहरण है। आज इस बदलते परिवेश में समय की बहुत ही कीमत है। हर किसी के पास पर्यावरण संरक्षण के लिए समय नहीं। इसी का परिणाम है कि आज हर मौसम का आनंद लोग नहीं उठा पाते। वो दिन दूर नहीं जब मौसम की मार से लोग परेशान होंगे। भाग दौड़ भरी जिदगी में लोग पर्यावरण संरक्षण में योगदान देना भूल गए हैं। कभी कभार बाजार से दो तीन पौधे लाकर अपने बगानी या गमले में लगाकर छत पर रख दिए और हो गया पर्यावरण संरक्षण। लेकिन पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कोई कदम नहीं उठाता। जिससे की हमारी अगली पीढ़ी को एक अच्छा वातावरण दे सके। शहरीकरण करने, ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क चौड़ीकरण तथा कई निजी कार्यों के लिए पेड़ काटे जा रहे हैं। जिससे पेड़ों की संख्या में हर दिन कमी आ रही है। लेकिन विभाग इस बारे में अनजान है। विदेशी पौधे बढ़ा रहे शोभा: जिला के कई कार्यालयों में विदेशी पौधे शोभा के लिए लगाए गए हैं। जहां की वो घरों का शोभा मात्र बन कर रह गए हैं। विदेशी किस्म के पौधें उतनी मात्रा में आक्सीजन देने का काम नहीं करते जितने की देववृक्षों द्वारा आक्सीजन मिलता है। एक रिसर्च के मुताबिक देववृक्षों से 24 घंटे में 14-18 घंटे आक्सीजन देने का काम करते हैं। लेकिन फिर भी लोग विदेशी पौधों के पिछे पागल है। मगर एक खास बात यह है कि विदेशी किस्म के पौधो को न तो कोई पशु खाता है और न ही उसको हर दिन पानी देने की आवश्यकता है। कुल मिलाकर समय की पाबंदी ने देववृक्षों से लोगों का नाता तोड़ दिया है। देव वृक्षों में शामिल पौधे: दरअसल पौधों को देववृक्ष कहने का काम सर्व प्रथम किसानों ने किया। हिन्दू समाज में आज भी कई पेड़ पौधों को पूजा जाता है। जहां एक ओर लोग उसे धर्म की ²ष्टि कोण से देखते हैं तो दूसरी ओर साइंटिफिक। हिन्दू धर्म में पीपल, आम, तुलसी, आंवला आदि पौधों की पूजा की जाती है। जबकि उपरोक्त पौधे 18 घंटे आक्सीजन देने का काम करते हैं। जिसमें की आम, जामुन, आंवला, नीम, शिशम, तुलसी, महोगनी, आदि पौधे देववृक्ष के नाम से जाने जाते हैं। इसके अलावा देववृक्षों से लोगों को फल फुल की भी प्राप्ति होती है। वहीं विज्ञान की ²ष्टि से देखा जाए तो इसको फाइकस प्रजाति के पौधे कहें जाता है। इस साल वन महोत्सव मे ज्यादा तर विभाग की ओर से विदेशी पौधे लगाए गए। क्या कहते हैं डीएफओ: इस संबंध में पूछे जाने पर डीएफओ विकास अहलावत ने बताया कि जिले में वन महोत्सव के दौरान करीब तीन लाख पौधे लगाए गए थे। जिसमें फाइकस प्रजाति को अधिक महत्व दिया गया। नर्सरी में भी फलदार ही पौधे लगाए गए है।
