कैमूर: आदि काल से मुंडन का संस्कार चलते आ रहा है। हिन्दू धर्म में 16 मुख्य संस्कारों में से एक संस्कार मुंडन भी है। शिशु जब जन्म लेता है तब उसके सिर पर गर्भ के समय से ही केश पाए जाते हैं जो हिन्दू धर्म में अशुभ माना जाता है। मानव जीवन चौरासी लाख योनी के बाद मिलता है। ऐसा पुराणों में मान्यता है कि पिछले सभी जन्मों के ऋणों को उतारने तथा पाप कर्मों से मुक्ति के उद्देश्य से जन्म के समय का मुंडन के समय केश कट जाते हैं। मुंडन के समय शिखा छोड़ने की परंपरा भी कहीं-कहीं है। मुंडन के पीछे मान्यता यह है कि उससे दिमाग की भी रक्षा होती है। साथ ही साथ राहू ग्रह की भी शांति होती है। अधिकांशत: मुंडन जन्म से एक वर्ष तीन वर्ष तथा पांचवें वर्ष तक होता है। हिन्दू धर्म शास्त्र के अनुसार एक वर्ष से कम में मुंडन कराने पर शरीर पर बुरा असर पड़ता है। मंदिर के प्रधान पुजारी उमेश मिश्रा ने बताया कि दोनों नवरात्र में मुंडेश्वरी धाम में मुंडन का विशेष महत्व है। क्योंकि मां भगवती मुंड राक्षस का वध कर अपने शक्ति का विस्तार की है। मुंड कर्म ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, जनेऊ धारण के समय तथा गुरूकुल में शिक्षा ग्रहण करने के समय भी किया जाता है। ज्ञात हो कि अधिकांश लोग अपनी मन्नत के अनुसार भी मुंडन कार्य अलग-अलग देवी मंदिरों में करवाते हैं। माता मुंडेश्वरी धाम में मुंडन के बाद बच्चे को स्नान कराकर नए कपड़े पहना कर दर्शन कराते हैं।

Posted By: Jagran

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