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जमुई की किऊल नदी से बालू गायब, छठ घाटों पर कीचड़ और गड्ढों का जाल, कैसे होगी छठ पूजा की तैयारी

Published: Tue, 27 Oct 2026 09:30 PM (IST)

जमुई की किऊल नदी में अवैध बालू खनन से उसकी पहचान बदल गई है, जिससे छठ पूजा की तैयारियों पर ...और पढ़ें

किऊल नदी के तट पर छठ घाट की सफाई और समतलीकरण करते मशीन

किऊल नदी के तट पर छठ घाट की सफाई और समतलीकरण करते मशीन 

HighLights

  1. किऊल नदी में अवैध बालू खनन से प्राकृतिक स्वरूप नष्ट।

  2. छठ घाटों पर मुलायम बालू की जगह कीचड़-गड्ढे।

  3. नगर परिषद कीचड़ हटाकर घाट बनाने को मजबूर।

संवाद सहयोगी, जमुई। कभी किऊल नदी की पहचान उसकी सफेद बालू की चादर और निर्मल जलधारा से हुआ करती थी। नदी के दोनों किनारों पर दूर तक फैली महीन बालू और बीच से बहती कंचन जैसी धारा इसकी सुंदरता में चार चांद लगाती थी।

लेकिन, पिछले एक दशक में हुए बेतरतीब बालू उठाव ने नदी की पूरी तस्वीर ही बदलकर रख दी है। अब इसका सीधा असर लोक आस्था के महापर्व छठ पर भी साफ दिखाई देने लगा है।

हालात यह हैं कि जहां कभी छठ व्रती मुलायम बालू पर दंडवत करते हुए घाट तक पहुंचती थीं, वहीं अब कंकड़, मिट्टी और कीचड़ के बीच घाट तैयार करने की जद्दोजहद चल रही है।

शहर के प्रमुख हनुमान घाट और खैरमा घाट की स्थिति इसका जीता-जागता उदाहरण है। इन घाटों पर कभी सफेद और महीन बालू की मोटी परत हुआ करती थी, जिस पर चलकर व्रती आसानी से किऊल नदी के निर्मल जल में स्नान कर भगवान भास्कर को अर्घ्य देती थीं।

इस बार नदी की तलहटी का नजारा पूरी तरह बदला हुआ है। बालू के स्थान पर काली मिट्टी, बड़े-बड़े गड्ढे और कीचड़ नजर आ रहे हैं, और कई जगहों पर नदी की धारा तक गायब दिखती है।

मशीनों से हो रही कीचड़ की खुदाई

घाट निर्माण के लिए नगर परिषद की एक्सवेटर मशीन बालू हटाने के बजाय काली मिट्टी और कीचड़ की खुदाई करने पर मजबूर है। जगह-जगह गड्ढों में जमा पानी और मिट्टी के ढेरों के बीच छठ घाट तैयार किया जा रहा है। ऐसे में व्रतियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि पर्व के दिन अर्घ्य देने के लिए सुरक्षित और सुगम रास्ता कैसे तैयार होगा।

यह समस्या सिर्फ हनुमान घाट तक सीमित नहीं है, बल्कि शहर के बिहारी घाट, त्रिपुरारी घाट, सूर्यनारायण घाट और गरसंडा घाट समेत अन्य प्रमुख छठ घाटों पर भी कमोबेश यही स्थिति बनी हुई है। नदी किनारे बालू की जगह मिट्टी और कंकड़ फैले होने के कारण वृद्ध महिलाओं और छोटे बच्चों के साथ घाट तक पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

बेतरतीब बालू उठाव से बिगड़ा नदी का संतुलन

स्थानीय लोगों का कहना है कि किऊल नदी में लंबे समय से बड़े पैमाने पर अवैध और अनियंत्रित बालू उठाव होता रहा है। नदी की तलहटी में लगातार कटाव और खुदाई होने से इसका प्राकृतिक स्वरूप नष्ट हो गया है।

रोजाना बड़ी संख्या में ट्रैक्टर और हाइवा के जरिए बालू का उठाव होने से नदी का पर्यावरणीय संतुलन चरमरा गया है। लोगों का कहना है कि जिस नदी को मां का दर्जा देकर हजारों लोग पूजा करते हैं, उसके अस्तित्व को बचाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर प्रभावी निगरानी क्यों नहीं की जा रही है।

मिशन मोड में सफाई और समतलीकरण का काम

इन तमाम मुश्किलों के बीच नगर परिषद ने महापर्व को लेकर घाटों की सफाई और समतलीकरण का काम तेज कर दिया है। दुर्गापूजा से ही शहर के प्रमुख घाटों पर सफाई अभियान चलाया जा रहा है।

सफाई मजदूर घाटों पर उगी घास और नदी में फैले कास की कटाई कर रहे हैं, जबकि एक्सवेटर मशीन से जमीन को समतल करने का प्रयास जारी है।

नगर परिषद के सफाई जमादार सागर कुमार ने बताया कि कार्यपालक पदाधिकारी के निर्देशानुसार सभी छठ घाटों की साफ-सफाई और समतलीकरण का कार्य मिशन मोड में किया जा रहा है। ए

क्सवेटर मशीनों के अलावा करीब 100 मजदूर प्रतिदिन मुस्तैदी से काम कर रहे हैं। दीपावली तक सभी प्रमुख घाटों की सफाई और निर्माण कार्य को पूरी तरह पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है ताकि व्रतियों को कम से कम असुविधा हो।

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