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जमुई में औषधीय खेती से संवरेगी आदिवासी महिलाओं की तकदीर! पूसा विवि दे रहा वैज्ञानिक प्रशिक्षण, सेहत व आय में सुधार

Published: Sun, 18 Oct 2026 04:04 PM (IST)

Jamui Tribal Women Herbal Farming: जमुई में डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, आदिवासी महिलाओं को औषधीय पौधों की ...और पढ़ें

Jamui Tribal Women Herbal Farming: जमुई की औषधीय संपदा को मिलेगा नया जीवन

Jamui Tribal Women Herbal Farming: जमुई की औषधीय संपदा को मिलेगा नया जीवन

HighLights

  1. आदिवासी महिलाओं को औषधीय खेती का प्रशिक्षण।

  2. दुर्लभ औषधीय पौधों का संरक्षण और उत्पादन।

  3. महिलाओं की आय, स्वास्थ्य, पोषण में सुधार।

संवाद सूत्र, सिमुलतला (जमुई)। Jamui Tribal Women Herbal Farming: जमुई जिले के प्राकृतिक जंगलों में तेजी से लुप्त हो रही अमूल्य औषधीय संपदा के संरक्षण और जनजातीय महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी शुरुआत हुई है। डा. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (समस्तीपुर) के वैज्ञानिकों की टीम ने जिले के सुदूर आदिवासी गांवों में औषधीय पौधों की वैज्ञानिक खेती और संरक्षण का विशेष अभियान छेड़ा है।

प्रथम चरण में चकाई प्रखंड के सतपोखरा और झाझा प्रखंड के सीमावर्ती आदिवासी बहुल गांवों की 50 से अधिक महिलाओं को औषधीय पौधों के उत्पादन, आधुनिक तकनीक और नर्सरी प्रबंधन का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

जंगलों के अंधाधुंध दोहन पर रोक

परियोजना प्रमुख सह एसोसिएट प्रोफेसर डा. दिनेश राय ने बताया कि जमुई के घने जंगल सदियों से दुर्लभ औषधीय पौधों के प्राकृतिक भंडार रहे हैं। हालांकि, अंधाधुंध और अनियोजित दोहन के कारण आज इनके प्राकृतिक अस्तित्व पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। दूसरी ओर, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आयुर्वेदिक बाजार में इन जड़ी-बूटियों की मांग तेजी से बढ़ रही है।

खेतों में व्यावसायिक उत्पादन

इसी मांग को अवसर में बदलते हुए वैज्ञानिकों की टीम इन दुर्लभ पौधों को खेतों में व्यावसायिक रूप से उगाने के लिए 'मिशन मोड' में काम कर रही है। औषधीय फसलों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि ये पथरीली और कम उपजाऊ भूमि में भी बेहद कम लागत में तैयार हो जाती हैं और पारंपरिक फसलों जैसे धान-गेहूं की तुलना में कई गुना अधिक शुद्ध मुनाफा देती हैं।

वैज्ञानिकों का उद्देश्य केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि बिचौलियों को हटाकर महिलाओं को सीधे बाजार से जोड़ना है ताकि उपज का वाजिब मूल्य मिल सके।

आजीविका के साथ परिवारों की सेहत और पोषण में सुधार

यह अभियान केवल आर्थिक स्वावलंबन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से आदिवासी परिवारों के स्वास्थ्य और पोषण स्तर को सुधारने की भी मजबूत रणनीति बनाई गई है। अभियान से जुड़े वैज्ञानिक डा. शंकर झा और डा. शिव शंकर प्रसाद ने बताया कि शतावरी, अश्वगंधा, तुलसी, बेल और आंवला जैसे औषधीय पौधों को महिलाओं और बच्चों की दैनिक दिनचर्या व खान-पान का हिस्सा बनाया जा रहा है। इससे स्थानीय स्तर पर कुपोषण की समस्या दूर होगी और बच्चों व महिलाओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) मजबूत होगी।

नवंबर-दिसंबर में पुनः दौरा

परियोजना की निरंतरता और सफलता सुनिश्चित करने के लिए वैज्ञानिकों का दल आगामी नवंबर-दिसंबर महीने में पुनः इन गांवों का सघन दौरा करेगा। इस दौरान पौधों के विकास का जायजा लेने के साथ ही जैविक खाद के सही अनुपात, टपक सिंचाई, कीट नियंत्रण और सूखे पौधों की जगह नए पौधे रोपने की तकनीक सिखाई जाएगी।

प्रोसेसिंग व वैल्यू एडिशन की ट्रेनिंग

परियोजना के अगले चरण में एलोवेरा, कालमेघ, करंज और अशोक जैसे उच्च मूल्य वाले औषधीय पौधों को भी जोड़ा जाएगा। इसके साथ ही महिलाओं को उत्पादों की स्थानीय स्तर पर प्राथमिक प्रोसेसिंग, सुखाने और वैल्यू एडिशन (मूल्य संवर्धन) का विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिससे वे सीधे हर्बल उत्पाद बनाकर अपनी आय में कई गुना इजाफा कर सकेंगी।

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