बिहार में दूसरों के घर रोशन करने वाले कुम्हारों के आंगन में कब जलेगी खुशियों की लौ, चाइनीज झालरों ने छीनी दीयों की चमक
दीपावली पर चीनी लाइटों के बढ़ते चलन से पारंपरिक मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों की आजीविका पर संकट गहरा ...और पढ़ें

एआई जनरेटेड फोटो
HighLights
चीनी लाइटों से कुम्हारों की दीया बिक्री में भारी गिरावट।
जमुई के बरहट में आय डेढ़ लाख से दस हजार पर सिमटी।
'वोकल फॉर लोकल' से स्थानीय कारीगरों को समर्थन की अपील।
संवाद सूत्र, बरहट (जमुई)। चांदी-सोने की जगमगाहट और आधुनिक चाइनीज लड़ियों के बाजार में छा जाने के बावजूद आज भी दीपावली की असली आत्मा मिट्टी के सोंधे दीयों में ही बसती है।
लेकिन यह बेहद दर्दनाक विडंबना है कि जो हाथ पूरे देश और समाज के घरों को रोशन करने वाले अनगिनत दीये गढ़ते हैं, उनके अपने घरों और चूल्हों पर अक्सर मुफलिसी का अंधेरा छाया रहता है।
दीपावली के इस पावन पर्व पर दैनिक जागरण की विशेष पड़ताल में बरहट प्रखंड के प्रजापति (कुम्हार) परिवारों की उम्मीदों, संघर्ष और उनके चाक की धीमी पड़ती रफ्तार की एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है।
दीपावली से हफ्तों पहले से ही चाक की खड़-खड़ और गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू से कुम्हारों के मोहल्ले गुलजार तो हो जाते हैं, लेकिन बाजार का बदलता मिजाज इनकी कमर तोड़ रहा है।
डेढ़ लाख से 10 हजार पर सिमटी दीयों की बिक्री
मलयपुर के बुजुर्ग कारीगर सीताराम पंडित अपनी आंखों में नमी और चेहरे पर मायूसी लिए बताते हैं कि वे महीनों पहले से दिन-रात एक करके हजारों दीये तैयार करते हैं।
उम्मीद होती है कि दीपावली पर अच्छी आमदनी होगी, जिससे बच्चों के लिए नए कपड़े और घर में मिठाई आएगी। लेकिन जब ग्राहक बाजार पहुँचते हैं, तो सजावटी लाइटों पर हजारों रुपये बिना हिचकिचाहट खर्च कर देते हैं, जबकि माटी के दीयों पर दो पैसे के लिए भी मोल-भाव करने लगते हैं।
सीताराम पंडित बताते हैं कि जब बाजार में चाइनीज सजावटी लाइटें नहीं हुआ करती थीं, तब वे एक दीपावली सीजन में करीब डेढ़ लाख दीये बेच लेते थे। उससे मिलने वाले पैसे से पूरे साल उनके परिवार का पेट पल जाता था। लेकिन अब कृत्रिम लाइटों के आ जाने के बाद 10 हजार दीये बेचना भी मुश्किल हो गया है।
'वोकल फॉर लोकल' से जगी उम्मीद, विशेषज्ञ की अपील
बाजार में सजी रंग-बिरंगी झालरों और इलेक्ट्रॉनिक दीपों ने पारंपरिक माटी कला से जुड़े परिवारों की आजीविका पर बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया और प्रशासनिक अभियानों के चलते 'वोकल फॉर लोकल' (Local for Vocal) के तहत मिट्टी के दीये अपनाने का रुझान जरूर बढ़ा है, लेकिन यह अभी पूरी तरह पर्याप्त नहीं है।
मामले पर प्रकाश डालते हुए विशेषज्ञ कृष्णकांत मिश्रा बताते हैं कि दीपावली केवल चकाचौंध रोशनी का नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक परंपरा और स्थानीय कारीगरों के सम्मान का पर्व है।
यदि हर नागरिक इस त्योहार पर कृत्रिम झालरों के बजाय अपने स्थानीय कुम्हार से खरीदे गए दीये जलाए, तो किसी गरीब और मेहनतकश परिवार के घर में भी दिवाली सचमुच रोशन हो सकती है।
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