बालू के लालच में जमुई की बरनार नदी का भूगोल तबाह, पाट में उगा कांस का जंगल
जमुई की बरनार नदी अवैध बालू खनन के कारण अपनी प्राकृतिक पहचान खो रही है।

नाले के रूप में बहती बरनार नदी। (जागरण)
HighLights
अवैध बालू खनन से बरनार नदी का स्वरूप बिगड़ा।
नदी का पाट कांस के जंगल और गड्ढों में बदला।
पर्यावरण, स्थानीय जीवन और श्रद्धालुओं को खतरा।
संवाद सूत्र, सोनो (जमुई)। कभी कल-कल बहती जलधारा और अपने विस्तृत पाट के लिए पहचानी जाने वाली बरनार नदी आज अपनी बदहाली की कहानी खुद बयां कर रही है।
कभी 100 मीटर से अधिक चौड़े पाट में पानी की लहरें हिलोरें मारती थीं, आज वहां कांस के घास का जंगल पसरा है। कहीं बालू के ऊंचे-नीचे टीले हैं तो कहीं गहरे गड्ढे। जलधारा भी कई जगह सिमटकर रह गई है।
नदी की यह तस्वीर सिर्फ प्रकृति के बदलते मिजाज की कहानी नहीं, बल्कि प्राकृतिक संपदा के अंधाधुंध दोहन और संरक्षण के प्रति बरती गई लापरवाही पर भी करारा सवाल है।
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि बालू के अवैध और अनियंत्रित उत्खनन ने बरनार नदी के प्राकृतिक स्वरूप को बुरी तरह बिगाड़ दिया है।
सवाल यह है कि जब नदी का भूगोल आंखों के सामने बदल रहा है, तब इसकी निगरानी करने वाला तंत्र आखिर कहां है? बरनार नदी के विस्तृत पाट में दूर-दूर तक फैले कांस के घास के झुरमुट इसकी बदलती पहचान का सबसे बड़ा संकेत बन गया है।
जहां कभी नदी का पानी फैलता था, वहां अब घास का जंगल दिखाई देता है। बीच-बीच में बालू के टीले, असमान तल और गहरे गड्ढे नदी की बदहाली को और उजागर करते हैं।
कभी जीवनदायिनी मानी जाने वाली नदी का यह हाल देखकर सहज ही सवाल उठता है कि आखिर इसके प्राकृतिक स्वरूप की रक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी?
ग्रामीणों का कहना है कि नदी से लगातार बालू निकाले जाने के कारण इसका तल कई स्थानों पर असमान हो गया है। नदी के पाट में कांस का फैलाव, सिमटी जलधारा और जगह-जगह बने गड्ढे एक ऐसी तस्वीर पेश करते हैं, जिसे नजरअंदाज करना भविष्य के संकट को आमंत्रण देने जैसा होगा।
बालू निकला, पीछे छूटे गड्ढे और खतरे
नदी के तल में बने गहरे गड्ढे अब केवल भूगोल बिगड़ने का संकेत नहीं, बल्कि जान-माल की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकते हैं। पानी भर जाने पर इनकी वास्तविक गहराई का अंदाजा लगाना मुश्किल होता है।

मां ब्रह्मदेवी मंदिर जाने वाले रास्ते में नदी में बालू उठाव के कारण बना गड्ढा। (जागरण)
नदी के आसपास जाने वाले ग्रामीणों, मवेशियों को पानी पिलाने वाले पशुपालकों और नदी पार करने वालों के लिए ऐसे स्थान दुर्घटना का कारण बन सकते हैं।
बच्चों की आवाजाही के मद्देनजर भी विशेष सतर्कता जरूरी है। बरनार नदी का महत्व केवल जलधारा तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध स्थानीय पर्यावरण, खेती-किसानी, पशुपालन और ग्रामीण जीवन से है।
नदी के प्राकृतिक स्वरूप में किसी भी तरह का गंभीर बदलाव आसपास के पर्यावरणीय संतुलन और जल व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में नदी को केवल बालू के स्रोत के रूप में देखना उसके व्यापक महत्व की अनदेखी होगी।
ब्रह्मदेवी मंदिर जाने वाले श्रद्धालुओं की राह में भी जोखिम
बरनार नदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध ब्रह्मदेवी मंदिर क्षेत्र के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां पूजा-अर्चना के लिए दूर-दराज से लोग पहुंचते हैं।
नदी के आसपास का असमान भू-भाग, गड्ढे और बदली हुई भौगोलिक स्थिति श्रद्धालुओं की आवाजाही को जोखिम भरा बना सकती है।
खासकर महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को नदी के संवेदनशील हिस्सों से गुजरते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है। आस्था के इस केंद्र तक पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए ताकि किसी दुर्घटना के बाद ही व्यवस्था की नींद न टूटे।
खनन विभाग की निगरानी पर सवाल, कार्रवाई कब?
बरनार नदी की मौजूदा स्थिति ने अवैध खनन पर नियंत्रण और प्रशासनिक निगरानी की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि नदी में नियमों के विरुद्ध बालू का उत्खनन हुआ है तो इसकी निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
ग्रामीणों और पर्यावरण के प्रति जागरूक लोगों ने जिला प्रशासन तथा खनन विभाग से बरनार नदी का स्थलीय निरीक्षण कराने, अवैध उत्खनन की शिकायतों की जांच करने और नदी के मौजूदा स्वरूप का तकनीकी आकलन कराने की मांग की है। बरनार नदी का बिगड़ता स्वरूप एक गंभीर चेतावनी है।
नदी का चौड़ा पाट, कांस के घास का फैलता जंगल, सिमटती जलधारा और गहरे गड्ढे भविष्य की चिंता बढ़ा रहे हैं। विडंबना यह है कि प्राकृतिक संपदा की रक्षा के लिए नियम-कानून मौजूद हैं, फिर भी नदी की बदहाली को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि आखिर बरनार नदी की स्थिति का जिम्मेदार कौन है? क्या खनन विभाग और जिला प्रशासन नदी के वर्तमान स्वरूप की जांच कराएंगे?
क्या अवैध उत्खनन के आरोपों की पड़ताल होगी और दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई की जाएगी? या फिर बरनार की यह बदहाली भी सरकारी फाइलों और निरीक्षणों के बीच दबकर रह जाएगी? बरनार नदी को बचाने के लिए अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि धरातल पर कार्रवाई की जरूरत है।
