थावे मंदिर: जंगल की हरियाली में मां विद्यावासिनी का दरबार, आस्था के साथ मिलेगा नौका विहार का आनंद
गोपालगंज का थावे विद्यावासिनी भवानी मंदिर शारदीय नवरात्र में लाखों श्रद्धालुओं का केंद्र है।

नौका विहार की सुविधा। फोटो जागरण
मिथिलेश तिवारी, गोपालगंज। शहर की कंक्रीट वाली जिंदगी और गाड़ियों के शोरगुल से महज छह किलोमीटर दूर निकलते ही हवा का मिजाज बदल जाता है।
गगनचुंबी पेड़ों की ओट से छनकर आती धूप, पक्षियों की चहचहाहट और फिजाओं में गूंजता ''जय माता दी'' का उद्घोष।
यह अहसास कराता है कि आप प्रकृति की गोद में बसे उस पावन क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं, जिसे दुनिया थावे विद्यावासिनी भवानी मंदिर के नाम से जानती है।
सिवान-गोपालगंज मुख्य मार्ग पर स्थित यह ऐतिहासिक मंदिर शारदीय नवरात्र में न केवल बिहार, बल्कि उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और पड़ोसी देश नेपाल तक के लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन जाता है।
भक्त की पुकार और राजा के अहंकार के अंत की गाथा
थावे मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है, जो अध्यात्म और लोककथाओं के अनूठे संगम को समेटे हुए है। मान्यता है कि यह 14वीं सदी की घटना है, जब यहां चेरो वंश के राजा मनन सेन का शासन था। राजा बेहद अहंकारी था। उसी दौर में मां दुर्गा के परम भक्त रहषु स्वामी भी इसी जंगल में रहते थे।
वे बाघ के गले में सांप की रस्सी बांधकर धान की दवनी (अनाज अलग करना) किया करते थे। जब यह बात राजा तक पहुंची, तो उसने इसे ढोंग माना और रहषु को चुनौती दी कि वे अपनी मां को यहां बुलाकर दिखाएं।
भक्त रहषु ने राजा को चेतावनी दी कि यदि मां यहां आईं, तो सर्वनाश हो जाएगा। मगर अहंकार में डूबा राजा नहीं माना।
रहषु की करुण पुकार पर जगतजननी मां भगवती खुद कामरूप-कामाख्या (असम) से चलकर थावे पहुंचीं। जहां मत्था टेके बिना मां की पूजा अधूरी मानी जाती है।
आस्था के साथ पर्यटन का तड़का
बदलते समय के साथ थावे सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि ईको-टूरिज्म का एक खूबसूरत केंद्र बन चुका है। मंदिर के चारों तरफ फैला घना जंगल प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर खींचता है।
इस बार नवरात्र में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आस्था के साथ-साथ प्रकृति को करीब से निहारने का मौका भी है। मंदिर परिसर के समीप बने जलाशय में नौका विहार (बोटिंग) की विशेष व्यवस्था की गई है।
सुबह की आरती के बाद या शाम के धुंधलके में घने पेड़ों की परछाई के बीच पानी की लहरों पर सैर करना, श्रद्धालुओं को एक अलग ही मानसिक शांति का अहसास करा रहा है।
रोजगार की रीढ़, लाखों का का 'पीड़िकिया' कारोबार
थावे केवल आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि यह गोपालगंज की स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है। स्थानीय व्यापारियों के अनुसार, नवरात्र के नौ दिनों में यहां स्थापित लगभग 500 से अधिक दुकानों के माध्यम से करोड़ों रुपये का प्रसिद्ध ''पीड़िकिया'' (गुझिया) प्रसाद, नारियल और चुनरी का कारोबार होता है।
इस साल शुरू हुए नौका विहार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ 50 से अधिक स्थानीय युवाओं को सीधे रोजगार के नए अवसर भी दिए हैं। अध्यात्म, प्रकृति और आजीविका का ऐसा खूबसूरत कोलाज विरले ही देखने को मिलता है।
