संकट में गोपालगंज की 250 साल पुराना बांसुरी उद्योग , मजदूरी करने को मजबूर हुए कारीगर
गोपालगंज के हथुआ स्थित मिस्कार टोली का 250 साल पुराना बांसुरी उद्योग आर्थिक संकट से जूझ रहा है, जिससे कारीगर पुश्तैनी काम छोड़कर मजदूरी करने को मजबूर हैं।

संकट में गोपालगंज की 250 साल पुराना बांसुरी उद्योग
HighLights
गोपालगंज का 250 साल पुराना बांसुरी उद्योग संकट में।
कारीगर आर्थिक तंगी के कारण पुश्तैनी काम छोड़ रहे हैं।
सरकारी मदद की उम्मीद में कारीगरों को निराशा हाथ लगी।
जागरण संवाददाता, गोपालगंज। हथुआ की मिस्कार टोली में बांसुरी की धुन अब आर्थिक संकट के बीच दबती जा रही है। पीढ़ियों से बांसुरी बनाने का हुनर संभाल रहे कारीगरों को छह साल पहले सरकारी मदद की उम्मीद जगी थी, लेकिन योजना बनने के बाद भी सहायता उनके हाथों तक नहीं पहुंच सकी। महंगे कच्चे माल, सीमित कारोबार और पूंजी के अभाव ने कारीगरों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
हालात ऐसे हैं कि कई कारीगर पुश्तैनी काम छोड़कर मजदूरी करने लगे हैं। मिस्कार टोली में करीब दो सौ मुस्लिम परिवार बांसुरी बनाने के काम से जुड़े हैं। यहां तैयार बांसुरी कभी कश्मीर से लेकर नेपाल तक भेजी जाती थी। अब कारोबार सिमटने से परिवारों की आमदनी प्रभावित हुई है। कारीगर अपने स्तर से इस पारंपरिक हुनर को बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।
हथुआ इस्टेट से जुड़ा है बांसुरी का इतिहास
मिस्कार टोली में बांसुरी बनाने का इतिहास हथुआ इस्टेट से जुड़ा है। हथुआ के ऐतिहासिक गोपाल मंदिर में करीब 250 वर्षों से प्रात: और संध्या आरती के समय बांसुरी चढ़ाने की परंपरा है। इसके लिए हथुआ इस्टेट ने बाहर से कारीगर बुलाकर उन्हें यहां बसाया था। तभी से पीढ़ी-दर-पीढ़ी बांसुरी निर्माण का काम चलता आ रहा है।
कारीगर बशीर मियां बताते हैं कि बांसुरी के लिए असम के सिलचर जिले से नाची बांस मंगाया जाता है। इसके अलावा नरकट और सकन्डे बांस का भी इस्तेमाल होता है। असम से नाची बांस मंगाने में अधिक खर्च आता है। कारोबार पूरे साल समान रूप से नहीं चलने के कारण लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है।
आर्थिक तंगी में छूट रहा पुश्तैनी काम
फेकू मियां और नूर मियां के अनुसार, टोली के करीब दो सौ परिवार इस काम से जुड़े हैं, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर है। महिला कारीगर रेहाना बताती हैं कि कम आमदनी के कारण कई कारीगर अब बांसुरी बनाने के बजाय मेहनत-मजदूरी करने लगे हैं। इससे नई पीढ़ी के इस पारंपरिक हुनर से जुड़ने की संभावना भी कम होती जा रही है।
मिथिला पेंटिंग से मिली थी नई पहचान
वर्ष 2001 में जिला प्रशासन ने कार्यशाला आयोजित कर कारीगरों को बांसुरी पर मिथिला पेंटिंग बनाने का प्रशिक्षण दिया था। इसके बाद यहां के कारीगर विशेष मांग पर बांसुरी पर मिथिला पेंटिंग भी बनाने लगे। करामात मियां बताते हैं कि इससे बांसुरी को अलग पहचान मिली, लेकिन कारीगरों की आर्थिक समस्या दूर नहीं हो सकी।
2017 में बनी थी मदद की योजना
मिस्कार टोली के भोला मियां बताते हैं कि वर्ष 2017 में तत्कालीन जिलाधिकारी ने बांसुरी कारीगरों के उत्थान के लिए वित्तीय सहायता और ऋण उपलब्ध कराने की दिशा में कार्रवाई का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रशासनिक स्तर पर योजना भी तैयार की गई।
कारीगरों को उम्मीद थी कि उन्हें कारोबार बढ़ाने के लिए पूंजी और अन्य सहायता मिलेगी। इसके बाद भी योजना का लाभ नहीं मिलने की बात कारीगर कहते हैं।
आज मिस्कार टोली के कारीगरों के सामने चुनौती सिर्फ बांसुरी बनाने की नहीं, बल्कि इस पुश्तैनी हुनर को बचाए रखने की भी है। हुनरमंद हाथ अब भी बांस को सुरों में ढाल रहे हैं, लेकिन उनकी नजरें सरकारी मदद की राह देख रही हैं।
