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पति की मौत, गोद में मासूम बेटा और आर्थिक संकट…, गया की प्रियंका ने नहीं छोड़ा पढ़ाई का साथ, BPSC में हुईं सफल

Published: Wed, 14 Oct 2026 03:50 PM (IST)

गया जिले की प्रियंका कुमारी ने पति की असामयिक मृत्यु और आर्थिक संकट के बावजूद पढ़ाई नहीं छोड़ी। उन्होंने दिन ...और पढ़ें

BPSC की परीक्षा पास कर श‍िक्ष‍िका बनीं प्र‍ियंका।

BPSC की परीक्षा पास कर श‍िक्ष‍िका बनीं प्र‍ियंका।

HighLights

  1. पति की मृत्यु के बाद भी पढ़ाई जारी रखी।

  2. दिन में काम और रात में पढ़ाई कर सफलता पाई।

  3. बीपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण कर शिक्षिका बनीं प्रियंका।

संवाद सूत्र, बाराचट्टी (गया)। गया जिले के बाराचट्टी प्रखंड अंतर्गत तेतरिया गांव की प्रियंका कुमारी की कहानी संघर्ष की उन अनकही परतों को सामने लाती है, जहां जिंदगी की जिम्मेदारियां उम्र से पहले कंधों पर आ जाती हैं।

जिस उम्र में किसी को परिवार और अपनों के सहारे की जरूरत होती है, उसी दौर में प्रियंका के सामने अपने छोटे बेटे की परवरिश, घर की आर्थिक जरूरतों और भविष्य की चिंता एक साथ खड़ी हो गई।

पति की मौत के बाद मुश्किलों से उबारने वाला कोई सहारा नहीं था। ऐसे में उन्होंने अपने साहस को ही अपनी ताकत बनाया और शिक्षा के रास्ते पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया।

शादी के दो साल बाद ही सर्पदंश से हो गई थी पत‍ि की मौत

वर्ष 2012 में विवाह के बाद प्रियंका के जीवन ने नई दिशा पकड़ी थी। लेकिन वर्ष 2014 में सांप के काटने से पति की मृत्यु ने उनकी दुनिया बदल दी।

गोद में बेटा बिट्टू था। उसकी परवरिश और भविष्य की जिम्मेदारी अब उनके सामने थी। आर्थिक संकट के बीच यह तय करना आसान नहीं था कि पहले परिवार की जरूरतें पूरी की जाएं या अपने सपनों को आगे बढ़ाया जाए।

प्रियंका ने दोनों जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ने के बजाय कठिन रास्ता चुना। उन्होंने कमाने के साथ पढ़ाई जारी रखने का फैसला किया।

दिन में बच्चों को पढ़ाया, रात में अपने सपनों के लिए जगीं

प्रियंका ने गांव के एक निजी विद्यालय में कम मानदेय पर पढ़ाना शुरू किया। इससे परिवार की जरूरतें पूरी नहीं होती थीं, इसलिए शाम में बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाने लगीं।

दिनभर विद्यालय में पढ़ाना, बेटे की देखभाल करना और घर की जिम्मेदारियां निभाना उनकी दिनचर्या बन गई। रात में जब घर शांत होता, तब वह अपनी किताबें खोलकर बैठती थीं।

कई बार महज तीन-चार घंटे की नींद लेकर अगले दिन फिर उसी संघर्ष में जुट जाती थीं। उनके इस सफर में सबसे बड़ी ताकत कोई बाहरी सहारा नहीं, बल्कि खुद पर भरोसा और आगे बढ़ने का संकल्प था।

जब जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ता गया, तब उन्होंने अपने लक्ष्य को छोड़ने के बजाय मेहनत बढ़ा दी। यही जिद धीरे-धीरे उनकी सफलता की बुनियाद बनी।

अभावों के बीच तैयारी, मेहनत से हासिल किया मुकाम

प्रियंका ने वर्ष 2017-18 में राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान से डीएलएड की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद सरकारी शिक्षिका बनने के लक्ष्य के साथ तैयारी जारी रखी।

लगातार मेहनत का परिणाम वर्ष 2023 में मिला, जब उन्होंने बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण की। आज वह प्राथमिक विद्यालय तेतरिया में शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं। अपने बेटे बिट्टू की पढ़ाई और बेहतर भविष्य के लिए भी प्रयासरत हैं।

सहारे का इंतजार नहीं, खुद बनें अपनी ताकत

आज की जेन जी यानी नई पीढ़ी की युवतियों के लिए प्रियंका का जीवन आत्मनिर्भरता का मजबूत संदेश देता है। उनके संघर्ष से यह सीख मिलती है कि हर किसी को जीवन में अनुकूल परिस्थितियां या मददगार हाथ नहीं मिलते।

कई बार अपने सपनों तक पहुंचने के लिए खुद ही रास्ता बनाना पड़ता है। आत्मनिर्भरता का अर्थ सिर्फ नौकरी पाना नहीं, बल्कि मुश्किल समय में निर्णय लेने, जिम्मेदारियां निभाने और अपने भविष्य को अपने प्रयासों से आकार देने की क्षमता भी है।  

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