गया [आलोक रंजन]। करगिल  युद्ध में विजय की कहानी लिखी गई तो शहीद होने वालों में दो नाम बिहार के गया जिले के टिकारी से भी थे। यहां के दो बेटों ने देश की आन-बान-शान पर खुद को कुर्बान कर दिया। लेकिन, दुखद बात तो यह है कि उनके नाम पटना के कारगिल चौक पर बनाए गए शहीद स्मारक पर अभी तक दर्ज नहीं हो सके हैं। गया में उनके गांवों तक सड़क व अन्य सुविधाएं भी नहीं पहुंचीं।

पूरी नहीं हो सकीं की गईं घोषणाएं

गया के टिकारी स्थित अलीपुर थाना क्षेत्र में केसपा पंचायत का एक गांव है कुतलुपुर। यहां के रामपुकार शर्मा एक जुलाई 1999 को करगिल में दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। गांव में स्मारक के पास उनकी आदमकद प्रतिमा बनी हुई है, जहां उनकी जयंती और शहादत दिवस पर श्रद्धा के फूल चढ़ाए जाते हैं।

सरकार ने शहादत पर गांव के विकास को लेकर कई घोषणा की थी। तत्कालीन जिलाधिकारी अमृतलाल मीणा ने अस्पताल निर्माण और कुतलपुर तक शहीद के नाम पर सड़क निर्माण का आश्वासन दिया था। सड़क ही नहीं बनी तो नामकरण भी नहीं हुआ। पटना के करगिल स्मारक पर भी उनका नाम दर्ज नहीं हो सका है।

रामपुकार शर्मा राष्ट्रीय रायफल गढ़वाल 36 आरआर बटालियन में लांसनायक थे। उनकी शहादत के नौ माह बाद पत्नी मीरा देवी भी चल बसीं। शहीद रामपुकार के बड़े भाई धनंजय शर्मा कहते हैं कि सरकार की घोषणा के बावजूद गांव और उनका स्मारक स्थल संपर्क मार्ग से आज तक नहीं जुड़ा। न ही शहीद द्वार का निर्माण हो सका। वे उस तिरंगे को रखे हुए हैं, जिसमें लिपटकर भाई का पार्थिव शरीर आया था।

शहीद की स्‍मृति में एक स्‍मारक तक नहीं

टिकारी प्रखंड के ही धर्मशाला गांव के मिथिलेश पाठक भी करगिल के युद्ध में शहीद हुए थे। उनके सम्मान में गांव के विकास के लिए गई घोषणाएं की गईं, पर कुछ पूरा नहीं हुआ। उनकी पत्नी कई वर्ष पहले ही बच्चों को लेकर मायके भागलपुर चली गईं। वे वहीं रह रही हैं।

शहीद मिथिलेश के बड़े भाई चंद्रविलास पाठक, छोटे भाई रंजीत पाठक, सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. रामानन्द शर्मा आदि कहते हैं कि उनके नाम पर गांव में एक स्मारक तक नहीं बना। उनकी आदमकद प्रतिमा लगा दी गई होती तो हर वर्ष लोग उनकी याद में श्रद्धा के दो सुमन तो अर्पित करते।

Posted By: Amit Alok