बिहार: मानपुर की 78 साल पुरानी परंपरा की विदेशों तक धूम, मां दुर्गा की आराधना कर रहे IITian और डॉक्टर
मानपुर की पटवा टोली में 78 साल पुरानी नवाह्न परायण परंपरा अब यूट्यूब के माध्यम से देश-विदेश में फैल रही है।

दुर्गा का पाठ। फोटो जागरण
HighLights
पटवा टोली की 78 साल पुरानी नवाह्न परायण परंपरा।
यूट्यूब पर सीधा प्रसारण, देश-विदेश से जुड़े लोग।
आईआईटीयन, डॉक्टर भी ऑनलाइन कर रहे मां दुर्गा की पूजा।
संदीप कुमार, मानपुर (बेगूसराय)। मानपुर के पटवा टोली में आस्था और आधुनिक तकनीक का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। यहां वर्ष 1946 से चली आ रही नवाह्न परायण पाठ की परंपरा अब यूट्यूब के माध्यम से देश-विदेश तक पहुंच रही है।
दुर्गा स्थान परिसर में आयोजित 9 दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान का सीधा प्रसारण यूट्यूब चैनल पर किया जा रहा है। इसके जरिए देश-विदेश में रह रहे पटवा समाज के आईआईटियन, डॉक्टर, इंजीनियर और अन्य सदस्य ऑनलाइन जुड़कर मां दुर्गा की आराधना कर रहे हैं।
पटवा टोली स्थित दुर्गा स्थान परिसर में प्रतिदिन करीब 200 महिला-पुरुष सामूहिक रूप से दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर आयोजित इस धार्मिक अनुष्ठान को डिजिटल माध्यम से जोड़ने से दूर-दराज में रहने वाले श्रद्धालुओं को भी अपनी जन्मभूमि, समाज और पारंपरिक धार्मिक आयोजनों से जुड़े रहने का अवसर मिल रहा है। ऑनलाइन प्रसारण के कारण विदेशों में रहने वाले समाज के सदस्य भी घर बैठे पाठ में सहभागी बन रहे हैं।
श्री दुर्गाजी पटवाय सुधार समिति के अध्यक्ष प्रमोद कुमार लाल और महासचिव डॉ. कृष्णा प्रसाद ने बताया कि मानपुर की पटवा टोली में दुर्गा पूजा और नवाह्न परायण पाठ की विशेष महत्ता है।
वर्ष 1946 से चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और सामूहिक सहभागिता के साथ निभाई जा रही है। इस आयोजन में स्थानीय व्यापारी, बुनकर, छात्र-छात्राएं और महिलाएं नियमित रूप से भाग लेते हैं।
उन्होंने बताया कि इंटरनेट और यूट्यूब के माध्यम से समाज के वैसे लोग भी अनुष्ठान से जुड़ पा रहे हैं, जो रोजगार, शिक्षा और अन्य कारणों से देश-विदेश में रह रहे हैं। ऑनलाइन प्रसारण उनके लिए अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने और बचपन की यादों को ताजा करने का माध्यम बन रहा है।
नई पीढ़ी को परंपरा से जोड़ने की पहल
नवाह्न परायण पाठ का यूट्यूब पर सीधा प्रसारण केवल धार्मिक अनुष्ठान को अधिक लोगों तक पहुंचाने का माध्यम नहीं है, बल्कि इससे नई पीढ़ी को भी अपनी सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकजुटता से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। परंपरा और तकनीक के इस मेल ने पटवा टोली के धार्मिक आयोजन को व्यापक पहचान देने का रास्ता खोला है।
