संजय कुमार, गया

माता-पिता के उपकार को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्हीं के आशीर्वाद से संतान फलता-फूलता है। ऐसे में संतान का कर्तव्य बनता है कि कुल के उद्धार के लिए सदा तत्पर रहे। पुत्र तभी सार्थक माना जाता है, जब वह अपने जीवनकाल में माता-पिता की सेवा करे और उनके मरणोपरात उनकी बरसी और पितृपक्ष में विधिवत श्राद्ध करे। दरभंगा जिले के सतीघाट प्रखंड के हरी नगर गांव से आए दो भाई आलोक (15) और त्रिलोक (10) ने अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए माता-पिता को मोक्ष दिलाने के लिए देवघाट पर कर्मकांड किया।

त्रिलोक चंद झा और आलोक चंद्र झा को कर्मकांड करते देख आसपास रहे लोगों की आंखें नम हो गई। वहीं, दोनों भाइयों के संस्कार को सभी ने सराहा। फल्गु नदी की रेत पर दोनों भाइयां ने हाथ जोड़कर माता-पिता के मोक्ष के लिए प्रार्थना की। उनके साथ दादी शैल देवी और नाना देवश्वर झा भी थे। रुआंसे आवाज में दादी कहती हैं, पहली बार गयाजी आए हैं। यहां आने के बाद बहुत शांति मिल रही है। बहुत हल्का महसूस कर रही हूं। बेटा अशोक झा की मृत्यु अचानक 2015 में हो गई थी। पति के वियोग में पुत्रवधु पार्वती देवी ने भी दुनिया छोड़ दी। दोनों पोते के सिर से माता-पिता का साया छिन गया। पुत्र और पुत्रवधु की मौत के बाद मन विचलित था। खुद को संभालने की लाख कोशिश की पर मन अशांत रहता था। आपपास के लोगों ने कहा कि एक बार गयाजी जाकर पिंडदान करा आएं। इसके बाद दोनों भाई को लेकर यहां आए हैं। तीन दिनों का कर्मकांड रविवार को पूरा हो गया। सोमवार को घर लौट जाएंगे। भगवान पुत्र एवं पुत्रवधु की आत्मा को मोक्ष दें। गयाश्राद्ध करने से पितरों को मोक्ष मिलता है। इसी आस्था के साथ हम गयाजी आए थे। भगवान श्री विष्णु उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें।

Posted By: Jagran

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