प्रकृति की गोद में बसा गया का गुरपा जंगल: औषधीय पौधों का खजाना, सुरक्षा के लिए वाटर होल और फायर लाइन तैयार
गया का गुरपा वन क्षेत्र, जो लगभग 138.4 वर्ग किलोमीटर में फैला है, जैव विविधता का एक अनमोल संगम है, जहाँ वन्यजीवों और औषधीय पौधों की भरमार है।

प्रकृति की गोद में बसा गया का गुरपा जंगल (एआई जेनरेटेड तस्वीर)
HighLights
गुरपा वन क्षेत्र जैव विविधता और औषधीय पौधों का अनमोल संगम।
वन्यजीवों हेतु वाटर होल, फायर लाइन और चौकियां स्थापित।
अवैध कटाई, शिकार रोकने को सामुदायिक भागीदारी पर बल।
संवाद सूत्र, फतेहपुर (गया)। झारखंड की सीमा से सटे गया जिले का गुरपा वन क्षेत्र सिर्फ पहाड़ और पेड़ों का विस्तार नहीं। बल्कि प्रकृति की गोद में बसा जैव विविधता का अनमोल संगम है। करीब 138.4 वर्ग किलोमीटर में फैले इस वन क्षेत्र में जंगल की घनी हरियाली के बीच वन्यजीवों की मौजूदगी इसे विशिष्ट बनाती है।
पहाड़ों, घाटियों और जंगलों के बीच कहीं भालू के पंजों के निशान मिलते हैं तो कहीं हिरण और नीलगाय के झुंड दिखाई देते हैं। सियार, लोमड़ी, मोर, खरगोश, गोह और नेवला समेत कई वन्य प्रजातियां भी यहां के प्राकृतिक आवास का हिस्सा हैं।
औषधीय और फलदार पौधों की विविधता
गुरपा के जंगल औषधीय और फलदार पौधों की विविधता के लिए भी जाने जाते हैं। इन जंगलों का महत्व केवल वन्यजीवों तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र पर्यावरण संतुलन कायम रखने, वर्षा जल को रोकने, भू जल संरक्षण और आसपास के इलाकों की जलवायु को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वन विभाग की ओर से गुरपा वन क्षेत्र में हर वर्ष पौधे लगाया जाता है। इनमें लगभग 65 प्रतिशत पौधे जीवित रह पाता है। पौधारोपण के साथ वन क्षेत्र में फलदार पौधों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। ताकि हरियाली बढ़ने के साथ वन्यजीवों को प्राकृतिक भोजन उपलब्ध हो सके।
गुरपा क्षेत्र में करीब 10 वन चौकियां स्थापित
गुरपा रेंजर रजनीश कुमार ने बताया कि विभागीय सर्वेक्षण के दौरान जंगल में भालू, हिरण, नीलगाय, सियार, लोमड़ी, गोह, नेवला और खरगोश समेत कई वन्यजीवों की मौजूदगी के साक्ष्य मिले हैं। जंगल के विभिन्न हिस्सों में भालू के पंजों के निशान भी मिले हैं। वन्यजीवों के लिए गर्मी और सूखे के समय पानी की उपलब्धता बनाए रखने को वाटर होल की व्यवस्था की गई है।
वन क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए विभाग ने गुरपा क्षेत्र में करीब 10 वन चौकियां स्थापित की हैं। वनकर्मियों की टीम नियमित गश्त करती है। अवैध कटाई, शिकार और जंगल को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर निगरानी रखी जा रही है।

जंगल में आग की घटनाओं को नियंत्रित करने के लिए फायर लाइन कटिंग की व्यवस्था की गई है। वन विभाग की ओर से ग्रामीणों को भी वन संरक्षण से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। स्थानीय लोगों की सहभागिता से जंगल की निगरानी और वन्यजीव संरक्षण को मजबूत करने की कोशिश है।
नुकसान पहुंचाने वालों के विरुद्ध वन अधिनियम के तहत कड़ी कार्रवाई
जैव विविधता से समृद्ध होने के बावजूद गुरपा वन क्षेत्र के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। लकड़ी की अवैध कटाई, अनियंत्रित चराई और शिकार जैसी गतिविधियां वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास के लिए खतरा बनी हुई हैं। जंगल में मानव गतिविधियों का बढ़ता दबाव भी चिंता का कारण है। विभाग का कहना है कि वन संपदा को नुकसान पहुंचाने वालों के विरुद्ध वन अधिनियम के तहत कड़ी कार्रवाई की जाती है।
गुरपा वन क्षेत्र को विभागीय स्तर पर गौतम बुद्ध वन्यजीव अभयारण्य के अंतर्गत संरक्षण क्षेत्र के रूप में देखा जाता है। समाजसेवी कक्कू सिंह, रंजीत साव, संतोष कुमार, राजेश मांझी का मानना है कि वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास की सुरक्षा, जलस्रोतों का संरक्षण, अवैध शिकार पर प्रभावी रोक और स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाकर गुरपा को एक महत्वपूर्ण वन्यजीव संरक्षण क्षेत्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।
