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Pitru Paksha: पितरों के मोक्ष के लिए फल्गु तट पर उमड़ेगी दुनिया, गयाजी में पिंड दान से पूर्वजों को मिलेगी तृप्ति

Published: Sun, 27 Sep 2026 10:25 PM (IST)

गयाजी में पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए पिंडदान व तर्पण का विशेष महत्व है, जो लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।

गयाजी में जुट रही भीड़। (जागरण)

गयाजी में जुट रही भीड़। (जागरण)

HighLights

  1. पितृपक्ष में गयाजी में पिंडदान से पूर्वजों को मिलती है तृप्ति।

  2. फल्गु, विष्णुपद, अक्षयवट प्रमुख पिंडदान स्थल हैं।

  3. मेला स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता, ऑनलाइन पिंडदान का विरोध।

कमल नयन, गयाजी। मगध की हृदयस्थली गयाजी को श्राद्ध और पिंडदान की सनातन परंपरा का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

पितृपक्ष के दौरान यहां लगने वाला एक पखवारे का मेला देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में रहने वाले सनातन धर्मावलंबियों के लिए भी विशेष महत्व रखता है।

मान्यता है कि पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके उद्धार की कामना से गयाजी में पिंडदान एवं तर्पण करने से पितरों को तृप्ति मिलती है। यही आस्था हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को गयाजी खींच लाती है।

पितृपक्ष के प्रथम दिन फल्गु नदी के तट पर जल से तर्पण के साथ पिंडदान का विधान शुरू होता है। इसके बाद विष्णुपद स्थित भगवान विष्णु के चरण चिह्न पर पिंड अर्पित किया जाता है।

श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार एक, पांच, सात, 15 अथवा 17 दिनों तक गयाजी में रहकर पिंडदान करते हैं। पंचकोस में स्थित पिंडवेदियों पर विभिन्न कर्मकांड संपन्न करने के बाद अक्षयवट वेदी पर पिंडदान के साथ अनुष्ठान का समापन होता है। इसके बाद तीर्थपुरोहित गयापाल पंडा द्वारा सुफल प्रदान किया जाता है।

54 पिंडवेदियां बनीं आस्था का केंद्र

गयाजी की पिंडदान परंपरा अत्यंत प्राचीन मानी जाती है। किंवदंती के अनुसार, कभी पंचकोस क्षेत्र में 365 पिंडवेदियां थीं, जहां वर्ष के प्रत्येक दिन पिंडदान का विधान होता था।

वर्तमान में इनकी संख्या 54 रह गई है। इनमें विष्णुपद, अक्षयवट सहित कई प्रमुख वेदियां श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखती हैं।विष्णुपद मंदिर गयाजी की धार्मिक पहचान का प्रमुख केंद्र है।

इसका जीर्णोद्धार महारानी अहिल्याबाई होलकर के काल में हुआ। मंदिर की स्थापत्य कला और गर्भगृह में प्रतिष्ठित भगवान विष्णु के चरण चिह्न श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं। काले पत्थर से निर्मित मंदिर की भव्यता पितृपक्ष के दौरान और अधिक निखर उठती है।

बदलते समय के साथ बदली पिंडदान की व्यवस्था

समय के साथ पितृपक्ष मेले का स्वरूप भी बदला है। पहले दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु तीर्थपुरोहितों के आवास पर ठहरते और प्रतिदिन अलग-अलग वेदियों पर जाकर पिंडदान करते थे।

अब होटल, धर्मशाला और अन्य आवासन सुविधाओं के साथ टेंट सिटी जैसी व्यवस्थाएं भी विकसित हुई हैं। देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा विदेशों से भी श्रद्धालु गयाजी पहुंच रहे हैं।

तकनीक के इस दौर में ऑनलाइन पिंडदान की व्यवस्था भी सामने आई है। हालांकि, गयापाल तीर्थपुरोहित इसका विरोध करते रहे हैं।

उनका कहना है कि गया की धरती पर पुत्र अथवा परिजन की प्रत्यक्ष उपस्थिति में किया गया तर्पण और पिंडदान ही परंपरागत विधान के अनुरूप है।

गयाजी के तीर्थपुरोहित गयापाल पंडा महेश लाल गुपुत कहते हैं कि आनलाइन पिंडदान की मान्यता धर्मशास्त्र में भी नहीं है। पुत्र को गयाजी आने के बाद ही उनके पितृ तृप्त होंगे।

अर्थव्यवस्था को मिलता है बड़ा आधार

पितृपक्ष मेला गयाजी की स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है। मेला अवधि में गया और बोधगया के होटल, धर्मशाला, परिवहन, खानपान, पूजा सामग्री और अन्य व्यवसायों में गतिविधियां बढ़ जाती हैं।

जिला प्रशासन श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा, आवासन और यातायात को लेकर व्यापक व्यवस्था करता है। सरकारी विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी जरूरत के अनुसार अस्थायी आवासन की व्यवस्था की जाती है।

गया चैम्बर ऑफ कामर्स के अध्यक्ष प्रमोद भदानी बताते हैं कि एक पखवारे का यह मेला गया के लिए महत्वपूर्ण है। हर क्षेत्र में इससे व्यवसाय को बल मिलता है। अच्छी व्यवसाय की उम्मीद रहती है।

हवाई, रेल और सड़क मार्ग से गयाजी पहुंचने की सुविधा इसे देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सुगम बनाती है।

फल्गु की धारा, विष्णुपद का चरण चिह्न और अक्षयवट की साक्षी में संपन्न होने वाला पिंडदान गयाजी की उस प्राचीन धार्मिक परंपरा को जीवंत रखता है, जिसमें श्रद्धा, स्मृति और पितरों के प्रति कृतज्ञता का भाव एक साथ दिखाई देता है।

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