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हाथों में पिंड, आंखों में स्वर्ग और मोक्ष की कामना... गहरपुर से प्रेतशिला तक क्यों पहुंचा परिवार? गयाजी में निभाई रस्म

Published: Wed, 30 Sep 2026 06:47 PM (IST)

समाजसेवी निकिल कुमार के माता-पिता कृष्णदेव शर्मा और उषा देवी ने गयाजी में पितरों के मोक्ष के लिए श्रद्धापूर्वक श्राद्ध ...और पढ़ें

प्रेतशिला में भी विधि-विधान से हुआ अनुष्ठान

प्रेतशिला में भी विधि-विधान से हुआ अनुष्ठान

HighLights

  1. निकिल कुमार के माता-पिता ने गयाजी में श्राद्ध कर्म किया।

  2. पितरों के मोक्ष और शांति के लिए पिंडदान व तर्पण।

  3. गहरपुर से प्रेतशिला तक विभिन्न तीर्थों पर श्राद्ध अनुष्ठान।

जागरण संवाददाता, गयाजी। हाथों में पिंड, मन में पितरों के प्रति श्रद्धा और आंखों में उनके मोक्ष की कामना। इसी आस्था के साथ समाजसेवी निकिल कुमार के पिता कृष्णदेव शर्मा और माता उषा देवी ने गयाजी में विभिन्न तीर्थों पर श्राद्ध कर्म किया। पैतृक गांव गहरपुर से शुरू हुई धार्मिक यात्रा पुनपुन तीर्थ, विष्णुपद मंदिर और प्रेतशिला तक पहुंची। पूरे अनुष्ठान में धार्मिक परंपराओं और विधि-विधान का पालन किया गया।

गहरपुर से शुरू हुई श्राद्ध कर्म की यात्रा

श्राद्ध कर्म की शुरुआत टिकारी थाना क्षेत्र स्थित पैतृक गांव गहरपुर से हुई। यहां कुल देवी-देवताओं का आह्वान कर आशीर्वाद लिया गया।

इसके बाद परिवार पुनपुन तीर्थ पहुंचा। यहां घाट पर पितरों के निमित्त पिंडदान और तर्पण किया गया। धार्मिक विधि-विधान के अनुसार अनुष्ठान संपन्न कराया गया।

विष्णुपद मंदिर में पंचतीर्थों का पिंडदान

गयाजी पहुंचने पर परिवार ने पंडा मुन्ना लाल कुटी पाठक से आदेश और आशीर्वाद लिया। इसके बाद विष्णुपद मंदिर परिसर में पंचतीर्थों का पिंडदान किया गया।

भगवान विष्णु के चरणों का दर्शन-पूजन कर पितरों की शांति और मोक्ष की कामना की गई। परिवार ने श्रद्धा के साथ सभी धार्मिक प्रक्रियाएं पूरी कीं।

प्रेतशिला में भी विधि-विधान से हुआ अनुष्ठान

इसके बाद परिवार प्रेतशिला तीर्थ पहुंचा, जहां विधि-विधान के साथ पिंडदान किया गया। आचार्य मिथलेश पांडेय, राजगीर-नालंदा के नेतृत्व में भी धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। संबंधित आचार्यों के मार्गदर्शन में श्राद्ध कर्म की विभिन्न प्रक्रियाएं पूरी कराई गईं।

पितरों के प्रति श्रद्धा का महत्वपूर्ण माध्यम

परिवार ने कहा कि गयाजी में पिंडदान सनातन परंपरा में पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसी भावना के साथ विभिन्न वेदियों पर तर्पण और पिंडदान किया गया।

गहरपुर से शुरू हुई यह धार्मिक यात्रा पुनपुन, विष्णुपद और प्रेतशिला तक पहुंची और पूरे विधि-विधान के साथ श्राद्ध कर्म संपन्न हुआ।

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