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17 साल बाद पिता को मिला मोक्ष, मां से लिपटकर रो पड़ा बेटा; बोलीं- 'आज गयाजी में पति से हमेशा के लिए बिछड़ गई'

Published: Mon, 28 Sep 2026 03:42 PM (IST)

मध्य प्रदेश के भोपाल से सुनीता कौशिक अपने बेटे सुधीर के साथ गयाजी पहुंचीं, जहां उन्होंने 17 साल पहले दिवंगत हुए पति गोविंद राम कौशिक के लिए पिंडदान किया।

मां से लिपटकर रो पड़ा बेटा

मां से लिपटकर रो पड़ा बेटा

HighLights

  1. 17 साल बाद बेटे ने पिता के लिए किया पिंडदान।

  2. पिंडदान करते समय मां-बेटे की आंखें भर आईं।

  3. गयाजी में पितृकर्म का धार्मिक महत्व और आस्था।

जागरण संवाददाता, गयाजी। बिहार के गयाजी में पितृपक्ष के दौरान देशभर से लोग अपने पूर्वजों के पिंडदान के लिए पहुंच रहे हैं। इसी क्रम में मध्य प्रदेश के भोपाल से सुनीता कौशिक अपने बेटे सुधीर कौशिक के साथ गयाजी पहुंचीं। उद्देश्य था 17 साल पहले दिवंगत हुए पति और सुधीर के पिता गोविंद राम कौशिक के लिए पिंडदान करना।

कर्मकांड के दौरान पिता की यादें ताजा होते ही मां-बेटे भावुक हो गए। दोनों एक-दूसरे से लिपटकर काफी देर तक रोते रहे।

वहां मौजूद लोगों की नजर भी इस भावुक पल पर टिक गई। मां सुनीता ने कहा कि गयाजी में पति के लिए किया गया पिंडदान उनके लिए एक भावुक पड़ाव है।

2009 में हुई थी पिता की मौत

सुनीता कौशिक के मुताबिक, उनके पति गोविंद राम कौशिक का साल 2009 में निधन हो गया था। बीमारी के कारण उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था। पति की मौत के बाद परिवार ने उनकी यादों के साथ जीवन आगे बढ़ाया।

करीब 17 साल बाद सुनीता अपने बेटे के साथ गयाजी पहुंचीं। उनका कहना था कि इतने वर्षों तक उन्हें ऐसा महसूस होता रहा कि उनके पति उनकी यादों में उनके साथ हैं। लेकिन पितृकर्म पूरा करने के लिए गयाजी आना उनके लिए बेहद भावुक अनुभव रहा।

काशी से गयाजी तक पूरा किया पितृकर्म

सुधीर कौशिक ने बताया कि गयाजी आने से पहले काशी विश्वनाथ और बनारस के घाट पर भी पिता के लिए पिंडदान और धार्मिक कर्मकांड किए गए। इसके बाद गयाजी में पिंडदान की प्रक्रिया पूरी की गई।

पिता के लिए किए जा रहे कर्मकांड के दौरान सुधीर को उनके संघर्ष और परिवार के लिए किए गए प्रयास याद आने लगे। उन्होंने बताया कि पिता भले ही एक साधारण व्यक्ति थे, लेकिन परिवार के लिए उन्होंने काफी मेहनत की थी।

पिता की यादों के सहारे आगे बढ़ा जीवन

सुधीर के मुताबिक, उनके पिता ने उन्हें पढ़ाया-लिखाया और अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बनाया। आज वह मेडिसिन फर्म के क्षेत्र से जुड़े हैं और उनका अपना मेडिकल स्टोर है। जिंदगी में आगे बढ़ने के बावजूद पिता की कमी उन्हें हमेशा महसूस होती है।

उन्होंने कहा कि पिता के निधन के बाद से परिवार उनकी यादों के सहारे आगे बढ़ता रहा। गयाजी में पिंडदान के दौरान पुरानी यादें एक बार फिर सामने आ गईं और भावनाएं रोक पाना मुश्किल हो गया।

कर्मकांड के बीच पिता की यादें हुईं ताजा

सुधीर ने बताया कि जब वह पिंडदान के लिए बैठे तो उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे पिता की स्मृतियां उनके सामने हों। इसी दौरान उनकी मां भी भावुक हो गईं। मां को रोता देखकर सुधीर भी अपने आंसू नहीं रोक सके।

उनके अनुसार, यह उनके और उनकी मां के लिए बेहद भावुक क्षण था। 17 साल बाद पिता के लिए पिंडदान करते हुए उन्हें लगा कि उन्होंने अपने पुत्र होने का दायित्व पूरा किया है।

गयाजी में पिंडदान की धार्मिक मान्यता

गयाजी में पिंडदान और श्राद्ध का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। पितृपक्ष के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान करने पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

गयाजी में भगवान विष्णु से जुड़े धार्मिक स्थलों पर भी पितृकर्म किए जाते हैं। गरुड़ पुराण सहित हिंदू धार्मिक परंपराओं में गया तीर्थ की महिमा का उल्लेख मिलता है। इसी आस्था के चलते देश-विदेश से लोग अपने पूर्वजों के लिए यहां पिंडदान करने आते हैं।

मां के लिए भी भावुक रहा यह सफर

सुनीता कौशिक के लिए गयाजी की यात्रा सिर्फ एक धार्मिक कर्मकांड नहीं बल्कि पति की यादों से जुड़ा भावुक अनुभव भी रही। उन्होंने कहा कि बेटे द्वारा पति का पिंडदान करते देख उनके मन में वर्षों पुरानी यादें फिर से ताजा हो गईं।

मां-बेटे ने पिता को याद करते हुए कर्मकांड पूरा किया। 17 साल बाद गयाजी में किया गया यह पिंडदान उनके परिवार के लिए लंबे समय से जुड़ी एक धार्मिक और भावनात्मक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया।

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