गांधी जयंती पर ही उपेक्षित रहे बापू, गयाजी के लोको कॉलोनी में जलजमाव और जलकुंभी के बीच खड़ी रही प्रतिमा
गांधी जयंती के दिन गया जंक्शन की लोको कॉलोनी में महात्मा गांधी की प्रतिमा जलजमाव और जलकुंभी से घिरी रही, सुबह तक किसी ने सुध नहीं ली।
HighLights
गांधी जयंती पर गया में बापू की प्रतिमा उपेक्षित रही।
लोको कॉलोनी में प्रतिमा जलजमाव और जलकुंभी से घिरी रही।
स्वच्छता अभियान के बावजूद प्रशासनिक उदासीनता पर सवाल उठे।
सुभाष कुमार, गयाजी। दो अक्टूबर को सुबह 10 बजे तक गया जंक्शन की लोको कॉलोनी में स्थापित महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास कोई सुध लेने वाला नजर नहीं आया। प्रतिमा जलजमाव और जलकुंभी के बीच खड़ी रही। आसपास न सफाई हुई और न जलनिकासी की व्यवस्था।
दोपहर 12 बजे के बाद एक समाजसेवी वहां पहुंचे और जलजमाव के बीच जाकर बापू की प्रतिमा पर माला अर्पित कर उन्हें याद किया। इसके बाद भी प्रशासनिक स्तर पर प्रतिमा की सुध लेने वाला कोई नजर नहीं आया।
यह तस्वीर उस दिन की है, जब पूरे देश में गांधी जयंती मनाई जा रही थी। रेलवे और जिला प्रशासन की ओर से स्वच्छता अभियान चलाए जा रहे थे। बापू के स्वच्छता संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए कार्यक्रम हो रहे थे।
लेकिन गया जंक्शन की लोको कॉलोनी में उनकी प्रतिमा इन अभियानों से जैसे बाहर रह गई। स्वच्छता के संदेशों के बीच बापू की प्रतिमा के आसपास पसरी जलकुंभी व्यवस्था की खामोशी की कहानी कहती रही।
10 बजे तक इंतजार, कोई नहीं पहुंचा
गांधी जयंती के दिन सुबह से ही शहर के विभिन्न हिस्सों में बापू को श्रद्धांजलि देने का सिलसिला शुरू हो गया था। लेकिन लोको कालोनी में सुबह 10 बजे तक गांधी प्रतिमा के पास न कोई अधिकारी पहुंचा, न रेलवे का कोई प्रतिनिधि और न ही कोई औपचारिक श्रद्धांजलि कार्यक्रम हुआ।

प्रतिमा के चारों ओर जलजमाव था। पानी में जलकुंभी फैली थी। जिस स्थान को गांधी जयंती से पहले साफ किया जाना चाहिए था, वहां दो अक्टूबर की सुबह भी वही स्थिति बनी रही।
12 बजे के बाद समाजसेवी ने पहनाई माला
दोपहर 12 बजे के बाद एक समाजसेवी की नजर बापू की प्रतिमा पर पड़ी। उन्होंने जलजमाव और जलकुंभी के बीच पहुंचकर महात्मा गांधी की प्रतिमा पर माला अर्पित की। कुछ क्षण के लिए प्रतिमा पर श्रद्धा का फूल चढ़ा और बापू को याद किया गया।

यह माल्यार्पण किसी बड़े कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था। न मंच था, न भाषण और न ही प्रशासनिक आयोजन। बस एक व्यक्ति की संवेदना थी, जिसने बापू की प्रतिमा को जलकुंभी के बीच देखा और वहां पहुंचकर श्रद्धांजलि दी।
आजादी के बाद स्थापित हुई थी प्रतिमा
लोको कालोनी में स्थापित गांधी प्रतिमा आजादी के बाद रेलवे की ओर से स्थापित कराई गई थी। पुराने रेलकर्मियों के अनुसार, पहले गांधी जयंती पर रेलवे की ओर से यहां विशेष तैयारी होती थी। प्रतिमा के आसपास सफाई कराई जाती थी। परिसर को व्यवस्थित किया जाता था और अधिकारी-कर्मचारी बापू को श्रद्धांजलि देने पहुंचते थे।
समय के साथ यह परंपरा कमजोर होती गई। अब गांधी जयंती के दिन भी प्रतिमा के आसपास जलजमाव और जलकुंभी की स्थिति बनी हुई है।
स्वच्छता अभियान के बीच बापू भूले
गांधी जयंती पर रेलवे और जिला प्रशासन की ओर से स्वच्छता अभियान चलाए गए। लोगों को साफ-सफाई का संदेश दिया गया। लेकिन जिस महात्मा गांधी के नाम से स्वच्छता का संदेश जुड़ा है, उनकी प्रतिमा के आसपास सफाई का अभाव कई सवाल खड़े करता है।
बापू को याद करना सिर्फ माल्यार्पण तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनकी प्रतिमा की नियमित साफ-सफाई और सम्मानजनक रखरखाव भी उसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।
दो अक्टूबर की तस्वीर शायद यही सवाल छोड़ती है।जिस बापू ने देश को स्वच्छता और सत्य का रास्ता दिखाया, उनकी प्रतिमा को ही जब प्रशासनिक स्तर पर याद करने वाला कोई न हो, तो गांधी जयंती के आयोजन और उनके संदेश के बीच की दूरी कितनी बड़ी है? एक दिन माला चढ़ाकर बापू को याद कर लेना पर्याप्त नहीं। उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब साल के बाकी 364 दिन भी उनकी प्रतिमा सम्मान, स्वच्छता और देखभाल के बीच खड़ी दिखाई दे।
