प्रभात रंजन, पटना

कोरोना संक्रमण काल में हो रहे विधानसभा चुनाव में प्रचार-प्रसार के कई रंग देखने को मिल रहे। वोटरों को रिझाने और अपनी उपलब्धियां बताने के लिए प्रत्याशी इन दिनों कलाकार बन गए हैं। पटना में कई नए चेहरे अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। कोई नुक्कड़ नाटक तो कोई वाहन के जरिए वीडियो को दिखा चुनाव प्रचार में लगा है। प्रत्याशी लोगों को आकर्षित करने के लिए लोक कलाकारों के साथ स्वयं भी बांसुरी पर चुनावी राग छेड़ रखे हैं।

प्रत्याशियों के लिए चुनाव प्रचार करने वाले लोक कलाकारों की टीम के लीडर चितरंजन निराला ने बताया कि कई प्रत्याशी छोटे कलाकारों को बुलाकर लोकगीतों को जिंदा रखने में जुटे हैं। चुनाव के बहाने कलाकारों को भी महत्व देने में लगे हैं।

कलाकारों के साथ मिला रहे सुर

प्रत्याशी जिस गली-मोहल्ले में प्रचार को जा रहे हैं उनके साथ कलाकारों की टीम भी होती है। गांव देहात के लोक कलाकार गमछे से ढोलक को बांधे गले में लटकाए धुन बजाने में लगे हैं तो दूसरे कलाकार झाल से जुगलबंदी। ऐसे में प्रत्याशी भी बांसुरी बजा लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में लगे हैं।

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सुन बहना वोटवा दिह विकास के..

बेगूसराय से आए कलाकार चितरंजन निराला बताते हैं, प्रत्याशी के लिए वे गीत भी तैयार करते हैं। फिल्मी गीतों से इतर कलाकार भिखारी ठाकुर के बिदेसिया गीत और छठ गीतों की धुन पर चुनाव गीत तैयार कर लोगों के बीच प्रस्तुत कर रहे हैं। मनोरंजन के साथ वोट देने की अपील करने में लगे हैं। गीतों में 'सुन भइया, सुन काका, सुन बहना वोटवा दिह विकास के..', वहीं बिदेसिया धुन में 'अइल चुनाव अब पर्व लोकतंत्र के इ बार वोटवा दिह सोच समझ के..' आदि गीत गा रहे हैं। कलाकारों के साथ प्रत्याशी घर-घर जाकर लोगों को वोट देने की अपील करने में जुटे हैं। प्रत्याशी की मानें तो इससे लोकगीतों को बचाने के साथ ही चुनाव प्रचार भी हो रहा है। लोक कलाकारों की भी पहचान होती है।

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ढोल की थाप सुन घर

से निकलते हैं लोग

प्रत्याशी ने कहा कि ढोल, झाल, बांसुरी की आवाज सुन लोग घर से बाहर आते हैं और उनसे रूबरू होने का मौका मिला रहा है। साथ ही जनता की समस्याओं को समझने और समझाने का माध्यम भी बना है।

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