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गुजरात में मजदूरी कर सीखा हुनर, गांव लौटकर बनाया अपना ब्रांड; बिहार की अस्मिता ने ₹50000 से बदली किस्मत 

Published: Sun, 25 Oct 2026 03:59 PM (IST)

Asmita Kumari Success Story: शेरघाटी की अस्मिता कुमारी ने गुजरात से सिलाई का हुनर सीखकर गांव में रेडीमेड कपड़ों का कारोबार शुरू किया।

सिलाई करती अस्मिता। फोटो जागरण

सिलाई करती अस्मिता। फोटो जागरण

HighLights

  1. अस्मिता ने गुजरात से सिलाई का हुनर सीखा।

  2. 50 हजार से शुरू किया रेडीमेड कपड़ों का कारोबार।

  3. गांव में महिलाओं और किसानों को रोजगार दिया।

कौशलेंद्र कुमार, शेरघाटी (गया)। Asmita Kumari Success Story: हुनर, मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर शेरघाटी प्रखंड के नवादा गांव की अस्मिता कुमारी ग्रामीण आत्मनिर्भरता की मिसाल बन रही हैं।

स्नातक तक पढ़ाई करने वाली अस्मिता ने गुजरात के गांधीधाम-अंजार में सिलाई का हुनर सीखा और गांव लौटकर रेडीमेड कपड़ों का कारोबार शुरू किया।

आज वह कपड़ा निर्माण इकाई, रेडीमेड दुकान और सुधा दूध संग्रह केंद्र संचालित कर रही हैं। उनके प्रयास से 2 दर्जन गांवों के किसानों को दूध बेचने का माध्यम मिला है, जबकि महिलाएं काज-बटन का काम कर आमदनी अर्जित कर रही हैं।

50 हजार रुपये से शुरू किया कारोबार

अस्मिता वर्ष 2017 में अपने पति अजित कुमार के साथ रोजगार की तलाश में गुजरात गई थीं। वहां कलेक्शन इंडिया लिमिटेड में सिलाई का प्रशिक्षण लेकर दोनों महीने में 30 से 40 हजार रुपये तक कमाने लगे।

सितंबर 2019 में गांव लौटने के बाद उन्होंने स्थानीय स्तर पर रोजगार शुरू करने का निर्णय लिया। जीविका समूह से जुड़कर ऋण और करीब 50 हजार रुपये की पूंजी से तीन फरवरी 2020 को ‘पटेल शर्ट मेकर’ की शुरुआत की। पहले महीने 268 शर्ट तैयार कर बाजार में बेची गईं।

लॉकडाउन में टूटी रफ्तार, फिर संभाला कारोबार

कारोबार शुरू होने के कुछ समय बाद कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दीं। कच्चे माल की कमी और काम बंद होने से आर्थिक संकट पैदा हुआ।

हालांकि, अस्मिता और उनके पति ने हिम्मत नहीं हारी। दोबारा काम शुरू कर स्कूली बच्चों की पोशाक बनाने सहित कारोबार का विस्तार किया। वर्तमान में इकाई में सिलाई, कटिंग और प्रेस की मशीनें उपलब्ध हैं।

पूंजी और मशीनों की कमी बनी चुनौती

अस्मिता कारोबार को बड़े स्तर पर ले जाना चाहती हैं। इसके लिए उन्हें करीब दस लाख रुपये की पूंजी की जरूरत है।

उनके पति अजित कुमार के अनुसार, शर्ट बनाने का कपड़ा कोलकाता से मंगाना पड़ता है, जबकि मशीनें और अन्य सामग्री गुजरात से लानी पड़ती हैं।

काज-बटन के काम को आसान बनाने वाली एम्ब्रॉयडरी मशीन की कीमत भी करीब तीन से पांच लाख रुपये है।

महिलाओं को रोजगार देने का लक्ष्य

जीविका समूह से जुड़ी महिलाएं काज-बटन का काम कर घरेलू खर्च में योगदान दे रही हैं। अस्मिता अपनी निर्माण इकाई का पंजीकरण कराने और ट्रेडमार्क हासिल करने का प्रयास कर रही हैं।

उन्हें उम्मीद है कि वित्तीय सहायता और आधुनिक मशीनें मिलने पर कारोबार का विस्तार होगा और अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा। उनका प्रयास है कि गांव की महिलाओं को स्थानीय स्तर पर काम मिले, जिससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें।

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