दरभंगा में माइक्रो फाइनेंस का मकड़जाल, किस्त के दबाव और तकादे से परेशान होकर गांव छोड़ने को मजबूर हो रहे लोग
दरभंगा में माइक्रो फाइनेंस कंपनियों से लिए गए कर्ज का दबाव परिवारों के लिए मुसीबत बन गया है, जिससे कई ...और पढ़ें

दरभंगा में माइक्रो फाइनेंस का मकड़जाल (एआई जेनरेटेड तस्वीर)
HighLights
माइक्रो फाइनेंस कर्ज से ग्रामीण घर छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।
किस्त चुकाने के दबाव और प्रताड़ना से लोग परेशान हैं।
दरभंगा के कुशेश्वरस्थान में गहराया यह ऋण संकट।
संवाद सहयोगी, कुशेश्वरस्थान (दरभंगा)। छोटे-मोटे रोजगार के सहारे परिवार चलाने का सपना लेकर लिया गया कर्ज अब कई परिवारों के लिए मुसीबत बनता जा रहा है। निजी माइक्रो फाइनेंस कंपनियों से लिए गए ऋण की साप्ताहिक और पाक्षिक किस्त चुकाने के दबाव में कई परिवारों के गांव छोड़ने का दावा ग्रामीण कर रहे हैं।
आरोप है कि लगातार तकादे और प्रताड़ना से परेशान होकर लोग घरों में ताला लगाकर पलायन कर रहे हैं। कुशेश्वरस्थान पूर्वी और पश्चिमी प्रखंड के विभिन्न गांवों में सामने आ रही इस स्थिति ने ऋण वसूली के तौर-तरीकों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इलाके में एक दर्जन से अधिक निजी माइक्रो फाइनेंस कंपनियों और वित्तीय संस्थानों का कारोबार है।
किस्त जमा करने के लिए दूसरी कंपनी से कर्ज
ग्रामीणों के अनुसार, आधार और पैन कार्ड के आधार पर 50 हजार से 75 हजार रुपये तक का ऋण मिल जाता है। लेकिन, रोजगार या आमदनी का स्थायी साधन नहीं होने से किस्त चुकाना मुश्किल हो जाता है। एक कंपनी की किस्त जमा करने के लिए दूसरी कंपनी से कर्ज लेने का सिलसिला शुरू हो जाता है।
देखते ही देखते परिवार कई कंपनियों के कर्ज के जाल में फंस जाते हैं। पुरुषों के रोजगार के लिए दूसरे प्रदेशों में रहने के कारण घर की महिलाओं पर किस्त चुकाने की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है , जाे तकादे को सहन नहीं कर पा रही है।
कई गांवों से पलायन का दावा
ग्रामीणों के मुताबिक, पूर्वी प्रखंड के बुढ़िया सुकराती गांव से करीब 20 परिवार, केवटगामा से करीब 50 परिवार और छोटकी कोनिया से छह परिवार गांव छोड़ चुके हैं। वहीं, कुशेश्वरस्थान प्रखंड के बड़गांव और बलहा से भी करीब छह परिवारों के पलायन की बात कही जा रही है। हालांकि, पलायन करने वाले परिवारों की संख्या और उसके कारणों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
मधुबन गांव में दो मार्च 2025 को रीना देवी (45) की मौत को भी ग्रामीण कर्ज के दबाव से जोड़कर देखते हैं। स्वजन और ग्रामीणों का आरोप है कि कई कंपनियों की किस्त जमा करने की तारीख होने और राशि का इंतजाम नहीं होने से वह तनाव में थीं। हालांकि, इस मामले में कर्ज वसूली की भूमिका की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
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