दरभंगा। शब्द शिल्पी और महान कल्पनाशील व्यक्तित्व के धनी डॉ. ब्रजकिशोर वर्मा 'मणिपद्म' साहित्यकार होने के साथ-साथ स्वतंत्रता सेनानी भी थे। घनश्याम प्रखंड में अवस्थित बाउर गांव निवासी मणिपद्म का जीवन घुमंतु रहा। तिब्बत के पठारों बौद्ध लामाओं के संग भी इन्होंने जीवन को तलाशा है। इनकी रचनाओं में पूरे भारतवर्ष का दर्शन स्वत: हो जाता है। 1953 में 'नयका बनिजारा' के लिए इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इनका संपूर्ण जीवन मिथिला-मैथिली के लिए समर्पित कर दिया। स्वयंसेवी संस्था डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन एवं मैथिली विभाग, एलएसएम कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को आयोजित ''मैथिली साहित्य में डॉ. ब्रजकिशोर वर्मा 'मणिपद्म' का योगदान' विषयक सेमिनार को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि लनामिविवि के पूर्व कुलपति प्रो. राजकिशोर झा ने ये बातें कहीं। डॉ. मंजर सुलेमान ने कहा कि मैथिली साहित्य जगत में 20 वीं शताब्दी के शलाका पुरूष कहलाने वाले 'मणिपद्म' के योगदान को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। मैथिली के साथ-साथ इन्होंने ¨हदी, अंग्रेजी एवं बंगला साहित्य को भी समृद्ध किया है।

मैथिली विभागाध्यक्ष डॉ. रमेश झा ने कहा कि मणिपद्म महामानव थे।

डॉ. उषा चौधरी ने कहा कि वे मैथिली के विकास लिए जमकर प्रयास किया। डॉ.बैद्यनाथ चैधरी 'बैजू' ने कहा कि जो ¨जदगी भर विद्यार्थी रहता है वहीं समाज राष्ट्रहित में कुछ कर पाता है और कोसी के लाल नाम से विख्यात मणिपद्म इसी प्रकृति के थे। मौके पर प्रबोध सम्मान से सम्मानित साहित्यकार केदार नाथ चैधरी लिखित मैथिली उपन्यास 'अयना' का विमोचन किया गया। सेमिनार में डॉ. ममता रानी ठाकुर, डॉ. मंजू चतुर्वेदी, डॉ. मीनू कुमारी, डॉ. कृष्ण कुमार, डॉ. सतीश कुमार, डॉ. शौकत अंसारी, डॉ. ऋषिकेष कुमार, डॉ. आरएन चैरसिया आदि मौजूद थे। संचालन डॉ. मुरलीधर झा, स्वागत डॉ. अजीत कुमार चौधरी ने एवं धन्यवाद ज्ञापन सचिव मुकेश कुमार झा ने किया।

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Posted By: Jagran