मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

दरभंगा । पहले मतदान के दिन आधी आबादी के अधिकांश मतदाता वोट गिराने के लिए बूथ पर जाने से कतराते थे। लेकिन अब मतदान केंद्रों पर आधी आबादी की लंबी कतार लगती है। महिलाएं पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक हुई हैं। यह कहना है मसानखोन निवासी गौरीशंकर मिश्र उर्फ वैध जी (97) का। कहते हैं कि पहले के चुनाव और आज के चुनाव में काफी अंतर है। पहले मतदान करने के लिए मतदाता काफी उत्साहित रहते थे। उम्मीदवार समाजसेवी एवं मिलनसार स्वभाव के होते थे। विभिन्न दलों की ओर से स्वच्छ छवि के लोगों को ही टिकट दिया जाता था। इसमें गरीबी बाधक नहीं थी। चुनाव प्रचार में तामझाम नहीं होता था। प्रत्याशी बैलगाड़ी एवं उनके समर्थक पैदल गांव गांव में नारे लगाते हुए प्रचार करते थे। मतदाताओं के घर जाकर अपने पक्ष में मतदान की अपील करते थे। चुनाव के समय गांव गांव में बैठक होती थी। प्रत्याशी बैठक में लोगों के विचार के अनुसार काम करने का आश्वासन देते थे। चुनाव जीतने के बाद उस वादे को पूरा भी करते थे। लोग अपनी पसंद के उम्मीदवार को भयमुक्त वातावरण में वोट देते थे। उम्मीदवार जब चुनाव जीत कर लोकसभा में जाते थे तो देश की सेवा एवं क्षेत्र की ज्वलंत समस्याओं को हल करने में अहम भूमिका निभाते थे। लेकिन अब वैसा कुछ भी नहीं है। प्रत्याशी का चयन विभिन्न राजनीतिक दलों के सुप्रीमो करते हैं। जिसमें धनबल और बाहुबल को प्राथमिकता दी जाती है। चुनाव प्रचार के लिए उम्मीदवार महंगी लग्जरी गाड़ियों के काफिले और समर्थकों के साथ गांव में पहुंच कर दबंग किस्म के लोगों से मिलकर उनके जिम्मे चुनाव प्रचार के कमान थमा देते हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों के स्टार प्रचारक हेलीकॉप्टर से क्षेत्र के मुख्य जगहों पर आते हैं और एक झलक दिखाकर चले जाते हैं। उम्मीदवार पहले की तरह अब भी जनता से विकास करने के तरह-तरह के वादे करते हैं लेकिन चुनाव जीतने के बाद सभी वादे भुला कर अपने कुनबे का विकास करने में जुट जाते हैं।

Posted By: Jagran

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