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दरभंगा में जिस ड्रेनेज सिस्टम से मिलनी थी राहत, वही बना आफत, 270 करोड़ की योजना में आउटलेट बंद

Published: Mon, 05 Oct 2026 01:18 PM (IST)

दरभंगा में 270 करोड़ रुपये की लागत से बन रहा 'स्टार्म वाटर ड्रेनेज सिस्टम' जलजमाव से राहत देने के बजाय आफत बन गया है, जिससे शहरवासी परेशान हैं।

नाका पाच के पास कराया जा रहा है नाला का निर्माण ।  जागरण

नाका पाच के पास कराया जा रहा है नाला का निर्माण । जागरण

HighLights

  1. 270 करोड़ का ड्रेनेज सिस्टम दरभंगा में आफत बना।

  2. धीमी गति, अव्यवस्थित खुदाई से जलजमाव की समस्या बढ़ी।

  3. पुराने आउटलेट बंद होने से शहर में पानी भर रहा।

जागरण संवाददाता, दरभंगा। स्मार्ट सिटी की ओर कदम बढ़ा रहे दरभंगा शहर को जलजमाव की गंभीर समस्या से स्थाई मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से 270 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से 'स्टार्म वाटर ड्रेनेज सिस्टम' पर काम किया जा रहा है। लेकिन, बेहतर प्रबंधन और योजना के अभाव में यह अति-महत्वाकांक्षी योजना फिलहाल आम जनता के लिए राहत के बजाय आफत का सबब बन चुकी है।

निर्माण कार्य की धीमी रफ्तार, अव्यवस्थित खुदाई और विभागीय तालमेल की कमी ने पूरे शहरी क्षेत्र की व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया है। परियोजना के तहत शहर के अलग-अलग सघन आबादी वाले इलाकों में सड़कों को खोदकर छोड़ दिया गया है।

सबसे बड़ी समस्या तब खड़ी हुई जब निर्माण के दौरान शहर की पारंपरिक जल निकासी वाले मुख्य 'आउटलेट्स' को बंद कर दिया गया। इसके चलते हल्की बारिश में भी मुख्य सड़कें और रिहाइशी मोहल्ले तालाब में तब्दील हो रहे हैं।

बेतरतीब तरीके से खोदे गए गड्ढों के कारण नगर निगम के सफाई कर्मियों के लिए पुराने नालों की सफाई करना भी बेहद कठिन हो गया है।

शहर का दरभंगा-लहेरियासराय वीआईपी रोड, कर्पूरी चौक, दरभंगा मेडिकल कालेज (डीएमसीएच) परिसर, अल्लपट्टी और दोनार जैसे प्रमुख व्यावसायिक व आवासीय क्षेत्र जलजमाव की चपेट में हैं।

आक्रोशित हैं स्थानीय नागरिक और प्रतिनिधि

स्थानीय निवासियों का कहना है कि जल निकासी का काम समय पर शुरू न होने और बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के आउटलेट बंद करने से स्थितियां बदतर हुई हैं।

दोनार निवासी धनजय सिंह ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि पिछले कई सालों से हम घुटने भर गंदे पानी में रहने को मजबूर हैं। हमारे छोटे-छोटे बच्चे इसी बदबूदार पानी से होकर स्कूल जाने को लाचार हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई सुध नहीं ली जा रही।

वहीं, वार्ड पार्षद गंगा मंडल ने सीधे तौर पर निर्माण एजेंसी बुडको की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि बुडको बिना किसी ठोस योजना और सही 'लेवलिंग' के काम कर रहा है।

नगर निगम और बुडको के बीच किसी तरह का आपसी समन्वय नहीं है। बिना किसी पूर्व तैयारी के पुराने आउटलेट्स बंद किए जाने से पूरा वार्ड पानी-पानी हो गया है।

अतिक्रमण और जमीन की कमी बड़ी चुनौती : बुडको

मामले पर बुडको के परियोजना निदेशक अभय कुमार पांडेय का कहना है कि नए ड्रेनेज नेटवर्क को जोड़ने के लिए कई स्थानों पर पुराने और अस्थायी आउटलेट को मजबूरीवश बंद करना पड़ा है, जिससे कुछ समय के लिए बहाव प्रभावित हुआ है।

इसके अलावा, घने इलाकों में सरकारी भूमि के अंतिम छोर पर नाला बनाने में जमीन की अनुपलब्धता और स्थानीय स्तर पर हुआ अतिक्रमण सबसे बड़ी बाधा है। जिला प्रशासन के सहयोग से इन बाधाओं को दूर कर जल्द कार्य पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है।

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