बिहार में मखाने की खेती से बिचौलिये सेहतमंद, औने-पौने भाव ने किसानों को रुलाया
Agricultural market : मखाना किसानों को इस बार बंपर उत्पादन के बावजूद भारी नुकसान हो रहा है, क्योंकि बाजार में ...और पढ़ें

तालाब से गुड़ी निकालकर जमा करते किसान । सौजन्य-किसान
HighLights
मखाना उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि, कीमतें आधी हुईं।
भंडारण की कमी, बिचौलियों के कारण किसान परेशान।
अंतरराष्ट्रीय मांग घटने से निर्यात पर बुरा असर।
विनय कुमार, दरभंगा । मखाना किसानों के चेहरे पर इस बार उपज देखकर जो रौनक आई थी, वह बाजार पहुंचते ही मायूसी में बदल गई। मखाना गुड़ी का उत्पादन तो रिकार्ड स्तर पर बढ़ा है, लेकिन भाव पिछले वर्ष के मुकाबले आधे से कम पर आ गया है।
तकनीक और उन्नत बीज के कारण राज्य में उत्पादन में पिछले साल के मुकाबले 26 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन बाजार की मार ने किसानों की कमर तोड़ दी है।
पिछले साल 30 से 35 हजार रुपये प्रति क्विंटल बिकने वाली गुड़ी इस बार गिरकर 14 से 17 हजार रुपये प्रति क्विंटल पर आ गई है। भंडारण की कमी, न्यूनतम समर्थन मूल्य न होने के कारण किसान पूरी तरह बिचौलियों और बड़े व्यापारियों पर निर्भर हैं। इस पूरे बाजार पर बिचौलियों का सिंडिकेट हावी है और उन्हीं के अनुसार मखाने का भाव तय हो रहा।
वर्ष 2023 में 22 से 25 हजार रुपये प्रति क्विंटल, 2024 में 26 से 28 हजार, 2025 में 30 से 35 हजार रुपये प्रति क्विंटल बिक्री हुई थी। 2026 में बंपर उत्पादन के बाद कीमत औंधे मुंह है।
बाजार में किसानों से गुड़ी 140 से 170 रुपये प्रति किलो खरीदी जा रही। लावा बनने के बाद थोक मंडी में इसकी कीमत 400 से 500 रुपये प्रति किलो आती है। पैकेट बंद या खुला मखाना आज भी आम उपभोक्ताओं को 800 से एक हजार रुपये प्रति किलो के भाव पर बेचा जा रहा है। बाजार में सी ग्रेड मखाना छह से आठ सौ, बी ग्रेड आठ से नौ सौ और ए ग्रेड हजार से 1400 रुपये किलो है।
खेती छोड़ने के मूड में किसान
केवटी के मखाना उत्पादक रंजीत कुमार सहनी कहते हैं, इस बार कर्ज लेकर तीन एकड़ में मखाना लगाया था। पानी से गुड़ी निकालने, छंटाई और मजदूरी की लागत 12 हजार रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा है।
अब मंडी में व्यापारी 14 हजार का रेट लगा रहे हैं। सालभर की मेहनत के बाद हमारे हाथ में प्रति क्विंटल दो हजार भी नहीं बच रहा है। जाले के किसान धीरेंद्र कुमार कहते हैं कि पिछले साल का भाव देखकर इस बार ज्यादा जमीन लीज (पट्टे) पर ली थी।
पट्टे का किराया ही 15 से 20 हजार रुपये प्रति एकड़ है। इस बार दाम आधे हो गए। हमें प्रति क्विंटल तीन से पांच हजार रुपये का सीधा घाटा हो रहा है। बिरौल के किसान अमरजीत सहनी कहते हैं कि मखाने की खेती में जोखिम बहुत है। छाती भर पानी में घुसकर गुड़ी निकालनी पड़ती है। लागत भी जेब से लग रही, यही हाल रहा तो अगले साल खेती छोड़ देंगे।
किसानों के सामने भंडारण की समस्या
जिला कृषि विपणन पदाधिकारी लोकनाथ ठाकुर का कहना है कि बिहार में 2023 में 35 हजार हेक्टेयर में खेती हुई थी। 50 हजार टन उत्पादन हुआ था। 2024 में 35 हजार हेक्टेयर में खेती और 56,800 टन उत्पादन हुआ।
वहीं 2025 की बात करें तो 38 हजार हेक्टेयर में खेती और करीब 60 हजार टन उत्पादन हुआ था, जबकि 2026 में 40 हजार हेक्टेयर में खेती हुई थी और 80,590 टन का उत्पादन हुआ है। इसमें अकेले दरभंगा का उत्पादन करीब 20 हजार टन है।
मखाना किसानों की सबसे बड़ी समस्या कोल्ड स्टोरेज और भंडारण की कमी है। दरभंगा में मखाने के लिए विशेष सरकारी कोल्ड स्टोरेज न के बराबर है। गोदामों में नमी के कारण गुड़ी खराब होने का डर रहता है।
घर में फसल रखने की जगह नहीं है। कर्ज का भी दबाव है, इसलिए वे फसल को रोक कर नहीं रख पाते। व्यापारी जानते हैं कि किसान ज्यादा दिन माल नहीं रख सकता। मजबूरी का फायदा उठाकर वे दाम और गिरा देते हैं।
दरभंगा मंडी के मखाना निर्यातक सुमित जालान कहते हैं कि बाजार मांग और आपूर्ति के नियम पर चलता है। पिछले साल माल कम था तो कीमतें रिकार्ड स्तर पर थीं। इस बार केवल दरभंगा ही नहीं, कटिहार, पूर्णिया और नेपाल के तराई इलाकों में भी मखाने का बंपर उत्पादन हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस बार निर्यात के आर्डर पिछले साल की तुलना में कम है, जिससे घरेलू बाजार में माल डंप हो गया है।
युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग में आई कमी
वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 255 करोड़ रुपये के मखाने का निर्यात किया था। वर्ष 2025-26 में अब तक 2.2 करोड़ का निर्यात हुआ है। इजराइल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण निर्यात संकट हुआ। ईरान द्वारा हार्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी के कारण समुद्री जहाजों की आवाजाही ठप हो गई। पुराना स्टाक क्लियर नहीं होने की वजह से वैश्विक खरीदारों ने नए आर्डर रोक दिए।
सरकार मखाना प्रोसेसिंग और कल्टीवेशन के लिए सब्सिडी दे रही है। इस बार अनुकूल मौसम के कारण उत्पादकता अच्छी रही है। कीमतों में जो गिरावट आई है वह अस्थायी है। किसान हड़बड़ी में पूरी फसल न बेचें। जिला प्रशासन स्तर पर मखाना क्लस्टर और एफपीओ को मजबूत किया जा रहा है ताकि किसान सीधे कंपनियों को बेच सकें।
नीरज कुमार झा, जिला उद्यान पदाधिकारी, दरभंगा।
