बक्सर में संस्थागत प्रसव को लग रही आशा की 'नजर', जान गंवा रहे मासूम
बक्सर में संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने के सरकारी प्रयासों के बावजूद, जच्चा-बच्चा की मौतें चिंता का विषय बनी हुई ...और पढ़ें

सांकेतिक तस्वीर
HighLights
आशा कार्यकर्ता गर्भवती महिलाओं को निजी अस्पतालों में भेज रही हैं।
निजी अस्पतालों में सुविधाओं की कमी से जच्चा-बच्चा की मौतें।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने आशा की भूमिका की समीक्षा की मांग की।
जागरण संवाददाता, बक्सर। सरकार द्वारा संस्थागत प्रसव को सुरक्षित मातृत्व और शिशु मृत्यु दर में कमी लाने का सबसे प्रभावी माध्यम माना गया है। इसी उद्देश्य से सरकारी अस्पतालों में प्रसव से जुड़ी सुविधाओं को लगातार बेहतर किया गया है।
बावजूद इसके जिले में हाल के दिनों में जच्चा-बच्चा की मौत की घटनाओं ने स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत को उजागर कर दिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो संस्थागत प्रसव को आशा की 'नजर' लग रही र्है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि मासूम जान गंवा रहे हैं। बड़ी बात यह है कि इन अधिकांश मामलों में सरकारी अस्पतालों की बजाय निजी नर्सिंग होम और अवैध रूप से संचालित अस्पतालों का नाम सामने आया है, जहां सुरक्षा मानकों की घोर अनदेखी की गई।
जिले में घटित हालिया घटनाओं पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि जिन निजी अस्पतालों में प्रसव के दौरान जच्चा-बच्चा या केवल जच्चा की मौत हुई, वहां आशा की भूमिका संदेह के घेरे में रही है।
आरोप है कि कुछ आशा चंद पैसों के लालच में गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पताल ले जाने की बजाय निजी अस्पतालों की ओर मोड़ रही हैं, जबकि आशा को ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे अहम कड़ी मानते हुए सरकार ने उन्हें लोगों और सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों के बीच सेतु के रूप में नियुक्त किया है। बताया जाता है कि निजी अस्पतालों से आशा का कमीशन सेट है और उसी कमीशन के चक्कर में वे मरीजों को झांसा दे रही हैं।
सरकारी अस्पतालों में अब प्रशिक्षित चिकित्सक, नर्स, आवश्यक दवाएं, एम्बुलेंस सुविधा और निशुल्क इलाज की व्यवस्था मौजूद है। इसके बावजूद प्रसव के समय महिलाओं को निजी अस्पतालों में ले जाना यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में गंभीर चूक हो रही है। जानकारों के अनुसार कई निजी अस्पताल न तो मान्यता प्राप्त हैं और न ही वहां प्रसव के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध हैं।
आपात स्थिति में ऐसे अस्पतालों में न तो विशेषज्ञ डाक्टर होते हैं और न ही रेफरल की समुचित व्यवस्था, जिससे हालात बिगड़ने पर जच्चा-बच्चा की जान खतरे में पड़ जाती है। दूसरी तरफ जब किसी निजी अस्पताल में लापरवाही से मौत होती है, तो मामला अक्सर प्राथमिकी तक नहीं पहुंच पाता। कहीं आपसी समझौते के जरिए मामले को दबा दिया जाता है, तो कहीं पीड़ित परिवार को डर या लालच देकर चुप करा दिया जाता है। इससे दोषियों के हौसले बढ़ते जा रहे हैं और मासूमों की जान अकाल मौत का शिकार हो रही है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संस्थागत प्रसव की मंशा को सही मायनों में सफल बनाना है, तो आशा की भूमिका की गंभीर समीक्षा जरूरी है। साथ ही निजी अस्पतालों की सख्त जांच, अवैध नर्सिंग होम पर कार्रवाई और प्रसव से जुड़ी हर मौत की निष्पक्ष जांच अनिवार्य है। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक गरीब परिवारों की जच्चा-बच्चा की जान यूं ही जोखिम में बनी रहेगी।
