बिहार की इस मिठाई के आगे फीकी पड़ती हैं आधुनिक मिठाइयां, 300 साल पुराना स्वाद; त्योहारों में 80 क्विंटल बिक्री
बिहार के शाहपुर की 300 साल पुरानी पारंपरिक मिठाई झरुआ आधुनिक मिठाइयों के दौर में भी अपनी पहचान बनाए हुए ...और पढ़ें

त्योहार आते ही बढ़ जाती है झरुआ की मांग
दिलीप कुमार ओझा, शाहपुर (भोजपुर)। शाहपुर (आरा): बिहार के शाहपुर की पहचान सिर्फ अपनी मिट्टी और संस्कृति से ही नहीं, बल्कि करीब तीन सौ साल पुरानी एक खास मिठाई से भी जुड़ी है। नाम है झरुआ। आधुनिक दौर में बाजार में मिठाइयों की दर्जनों नई किस्में आ गई हैं, लेकिन झरुआ का पारंपरिक स्वाद आज भी लोगों को अपनी ओर खींचता है।
खासकर दीपावली से लेकर छठ पूजा तक इसकी मांग अचानक कई गुना बढ़ जाती है। त्योहारों के मौसम में करीब एक सप्ताह के दौरान 70 से 80 क्विंटल तक झरुआ की बिक्री हो जाती है। इससे लाखों रुपये का कारोबार होता है और स्थानीय स्तर पर सैकड़ों परिवारों की आजीविका चलती है।
त्योहार आते ही बढ़ जाती है झरुआ की मांग
धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भैया दूज और छठ जैसे पर्व झरुआ बनाने वाले कारीगरों और कारोबारियों के लिए सबसे खास माने जाते हैं।
त्योहार नजदीक आते ही इसके निर्माण की रफ्तार बढ़ जाती है। मांग पूरी करने के लिए कारीगर दिन-रात मेहनत करते हैं। गोवर्धन पूजा और भैया दूज के दौरान ही करीब 30 से 40 क्विंटल झरुआ की बिक्री हो जाती है। इसके बाद दीपावली और छठ तक इसकी खरीदारी का सिलसिला जारी रहता है।
गुड़ और बेसन से बनती है शाहपुर की खास मिठाई
झरुआ की सबसे बड़ी खासियत इसका देसी स्वाद और पारंपरिक बनाने का तरीका है। इसे चने के बेसन से तैयार छोटी-छोटी बूंदियों से बनाया जाता है।
इन बूंदियों को घी या डालडा में छानने के बाद देसी गुड़ के पाग में मिलाया जाता है। गुड़ की प्राकृतिक मिठास और बेसन का स्वाद झरुआ को दूसरी मिठाइयों से अलग पहचान देता है। यही पारंपरिक स्वाद आज भी लोगों को आधुनिक मिठाइयों के बीच झरुआ की ओर खींचता है।
पूजा से लेकर मेहमानों तक, हर जगह खास मांग
झरुआ का इस्तेमाल केवल मिठाई के तौर पर नहीं होता। पूजा-पाठ और पर्व-त्योहारों में भी इसे विशेष महत्व दिया जाता है। लंबे समय तक सुरक्षित रहने के कारण लोग इसे पहले से खरीदकर घर में रख लेते हैं।
दीपावली की पूजा से लेकर गोवर्धन पूजा और छठ के प्रसाद तक में इसकी मांग रहती है। रिश्तेदारों और मेहमानों को देने के लिए भी लोग इसे पसंद करते हैं।
तीन सदियों से चली आ रही मिठाई की विरासत
शाहपुर में झरुआ बनाने की परंपरा करीब तीन सौ वर्षों से अधिक पुरानी बताई जाती है। स्थानीय कारोबारियों के अनुसार, वर्तमान में लगभग आधा दर्जन परिवार इस पारंपरिक मिठाई के निर्माण से जुड़े हुए हैं।
संतोष साह, तुला साह और श्रीभगवान साह के परिवार इस काम से लंबे समय से जुड़े प्रमुख परिवारों में बताए जाते हैं। ये परिवार सालभर झरुआ तैयार करते हैं, लेकिन त्योहारों के समय उत्पादन कई गुना बढ़ जाता है।
एक परिवार रोज बनाता है तीन से चार क्विंटल
त्योहारों के मौसम में झरुआ की बढ़ती मांग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक परिवार प्रतिदिन करीब तीन से चार क्विंटल तक इसका उत्पादन करता है।
शाहपुर के विभिन्न बाजारों के अलावा आसपास के इलाकों में भी इसकी आपूर्ति की जाती है। झरुआ की सामान्य कीमत फिलहाल करीब 120 से 130 रुपये प्रति किलोग्राम बताई जा रही है। वहीं विशेष गुणवत्ता वाले झरुआ की मांग भी समय-समय पर सामने आती रहती है।
सैकड़ों परिवारों की आजीविका से जुड़ी है झरुआ
झरुआ सिर्फ बनाने वाले परिवारों की कमाई का जरिया नहीं है। इसके कारोबार से बिक्री करने वाले सैकड़ों दुकानदार भी जुड़े हैं। त्योहारों के दौरान बढ़ती मांग से कारीगरों के साथ-साथ दुकानदारों और अन्य छोटे कारोबारियों को भी अतिरिक्त रोजगार मिलता है। इस तरह तीन सौ साल पुरानी यह मिठाई आज स्थानीय अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
बड़े नेताओं से लेकर धार्मिक आयोजनों तक पहुंचा स्वाद
शाहपुर के झरुआ की लोकप्रियता आम लोगों तक ही सीमित नहीं रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार, राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, शिवानंद तिवारी और प्रोफेसर केके तिवारी जैसे चर्चित राजनेता भी इसके स्वाद के मुरीद रहे हैं।
धार्मिक आयोजनों में भी झरुआ की खास जगह रही है। लक्ष्मी प्रपन्न जियर स्वामी के सानिध्य में आयोजित महायज्ञ और ज्ञान यज्ञ जैसे आयोजनों में भी झरुआ को प्रसाद के रूप में वितरित किए जाने की बात सामने आती है।
आधुनिक मिठाइयों के दौर में भी नहीं फीकी पड़ी मिठास
आज बाजार में रंग-बिरंगी और कई तरह की आधुनिक मिठाइयां उपलब्ध हैं, लेकिन झरुआ ने अपनी अलग पहचान कायम रखी है। इसकी खासियत सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि इसके पीछे जुड़ी सदियों पुरानी परंपरा है।
शाहपुर के लोगों के लिए पर्व पर झरुआ खरीदना एक तरह से अपनी संस्कृति और विरासत को आगे बढ़ाना भी है। यही वजह है कि तीन सौ साल से अधिक पुरानी यह मिठास आज भी लोगों की पसंद बनी हुई है।
झरुआ सिर्फ मिठाई नहीं, शाहपुर की पहचान है
शाहपुर का झरुआ आज एक मिठाई से कहीं आगे निकल चुका है। यह स्थानीय संस्कृति, परंपरा और रोजगार—तीनों को एक साथ जोड़ता है।
दीपावली से छठ तक इसकी बढ़ती मांग इस बात का प्रमाण है कि पुरानी चीजों की असली ताकत उनके स्वाद और उनसे जुड़ी भावनाओं में होती है।
तीन सौ साल से चली आ रही झरुआ की यह परंपरा आज भी नई पीढ़ी तक पहुंच रही है और शाहपुर की पहचान को मिठास दे रही है।
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