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गया जी जाने से पहले गांव में निकाली जाती है फेरी, भोजपुर में पूर्वजों के कर्ज से जुड़ी है यह अनोखी परंपरा

Published: Fri, 25 Sep 2026 03:37 PM (IST)

सनातन संस्कृति में पितृ श्राद्ध पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने की अनूठी परंपरा है। भोजपुर में गया ...और पढ़ें

पुनपुन में पिंडदान करते श्रद्धालु। जागरण

पुनपुन में पिंडदान करते श्रद्धालु। जागरण

HighLights

  1. पितृ श्राद्ध पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा।

  2. भोजपुर में गया जी जाने से पहले चुकाते हैं पूर्वजों का कर्ज।

  3. सार्वजनिक घोषणा कर पूर्वजों को ऋणमुक्त करने का संदेश देते हैं।

संवाद सूत्र, उदवंंतनगर (आरा)। सनातन संस्कृति में पितृ श्राद्ध पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने की अनूठी परंपरा है।

यह धार्मिक होने के साथ-साथ सामाजिक परंपरा भी है। मान्यता है कि पिंडदान के माध्यम से वंशज अपने पूर्वजों के भौतिक और आध्यात्मिक ऋण से उऋण होते हैं। 

पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। पिंडदान, तर्पण और ब्रह्म भोज के माध्यम से पितरों को जीवन-मरण के आवागमन से मुक्ति मिलने की मान्यता है।

गयाजी जाने की सार्वजन‍िक होती है घोषणा 

पितृ पक्ष में पिंडदान के लिए पिंडदाता गया जी जाते हैं। गया जी जाने से पहले वंशज अपने पूर्वजों द्वारा लिए गए जाने-अनजाने सांसारिक कर्ज को चुकाने की परंपरा भी निभाते हैं।

भोजपुर जिले में पितृ पक्ष शुरू होने से पहले ही गया जी जाने की घोषणा सार्वजनिक रूप से की जाती है, ताकि पूर्वजों द्वारा लिए गए किसी कर्ज की जानकारी मिल सके और उसका भुगतान कर उन्हें ऋणमुक्त किया जा सके।

गया जी पिंडदान यात्रा पर निकलने से पहले प्रथम पिंड घर में, दूसरा गांव की सीमा के पास और तीसरा पुनपुन नदी के घाट पर देने की परंपरा है। इसके बाद पिंडदाता गया जी के लिए प्रस्थान करते हैं।

कोहड़ा गांव निवासी योगेंद्र ओझा ने बताया कि गया जी जाने से पहले गांव में पूर्वजों का आह्वान, पूजन और पिंडदान किया जाता है।

ग्राम देवी-देवता की होती है आराधना 

इसके बाद ग्राम देवता और ग्राम देवी का आह्वान कर पिंडदान का कार्य निर्विघ्न संपन्न होने की प्रार्थना की जाती है। तत्पश्चात ग्राम फेरी कर जाने-अनजाने सभी पितरों को गया जी में होने वाले श्राद्ध में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाता है।

इस दौरान मिट्टी की कढ़ाई में अग्नि प्रज्वलित कर पिंडदाता आगे-आगे चलते हैं। उनके पीछे परिजन और ग्रामीण गाजे-बाजे के साथ गांव की परिक्रमा करते हैं।

पीली सरसों, अक्षत और जौ आदि का छिड़काव करते हुए गांव के सभी पितरों को गया जी श्राद्ध के लिए न्योता दिया जाता है।

कर्ज की जानकारीर सार्वजन‍िक करने का भी संदेश 

पंडित दिनेश पांडेय बताते हैं कि इस परंपरा के माध्यम से पिंडदाता अपने पूर्वजों से जुड़े कर्ज की जानकारी सार्वजनिक करने का संदेश देता है।

मान्यता है कि यदि पूर्वजों ने किसी से जाने-अनजाने में ऋण लिया हो तो इसकी जानकारी मिलने पर उसका भुगतान कर पूर्वजों को ऋणमुक्त किया जा सके।

गया जी पहुंचने के बाद फल्गु नदी के किनारे, विष्णुपद मंदिर और आकाशगंगा घाट समेत विभिन्न पवित्र स्थलों पर पितरों का पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध किया जाता है। गया श्राद्ध की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ब्रह्म भोज का आयोजन किया जाता है।

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