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गयाजी से भी पहले यहां होता है पिंडदान, कहा जाता है मोक्ष का प्रथम द्वार?

Published: Fri, 25 Sep 2026 01:56 PM (IST)

Pitru Paksha 2026:गयाजी में मुख्य पिंडदान से पहले पुनपुन नदी के तट पर पहला पिंडदान करने की प्राचीन परंपरा है। इसे ‘मोक्ष का प्रथम द्वार’ कहा जाता है।

HighLights

  1. पुनपुन नदी को मोक्ष का प्रथम द्वार माना जाता है।

  2. भगवान श्रीराम ने भी यहीं पहला पिंडदान किया था।

  3. पितृपक्ष में गयाजी से पहले यहाँ तर्पण का विधान है।

डिजिटल डेस्क, पटना। Pitru Paksha 2026: पितृपक्ष में अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना से देश-विदेश से श्रद्धालु गयाजी पहुंचते हैं।

फल्गु नदी के तट पर पिंडदान और तर्पण के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की धार्मिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव गयाजी से पहले भी है।

कुल 46 वेद‍ियों पर पिंडदान क‍िया जाता है। इनमें से 45 गयाजी में है, एक वेदी पुनपुन को माना जाता है। इसलिए यहां पहला पिंडदान क‍िया जाता है।  

मोक्ष का प्रथम द्वार है पुनपुन 

पटना के पास बहने वाली पुनपुन नदी को धार्मिक मान्यताओं में मोक्ष का प्रथम द्वार कहा गया है। मान्यता है कि गयाजी में पिंडदान करने से पहले पुनपुन नदी के तट पर स्नान, तर्पण और प्रथम पिंडदान किया जाना चाहिए।

राकेश कुमार उर्फ रिंकू बाबा बताते हैं क‍ि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम ने भी अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए सबसे पहले पुनपुन नदी के तट पर पिंडदान किया था।

इसके बाद वे गयाजी पहुंचे थे। यही वजह है कि पितृपक्ष में कई श्रद्धालु अपनी धार्मिक यात्रा की शुरुआत पुनपुन घाट से करते हैं।

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26 सितंबर से पितृपक्ष, 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या

वर्ष 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध से होगी। नियमित रूप से पितृपक्ष का आरंभ 27 सितंबर को कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से माना जाएगा। 

इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। इस दौरान गयाजी में पिंडदान के लिए देश के विभिन्न हिस्सों के साथ विदेशों से भी श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है।

गयाजी में पितृपक्ष मेला भी 25 सितंबर से 10 अक्टूबर तक आयोजित किया जा रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार गयाजी को मोक्ष की भूमि माना जाता है और यहां पिंडदान का विशेष महत्व है।

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पुनपुन को क्यों कहा जाता है मोक्ष का प्रथम द्वार?

पंड‍ित गंगाधर शर्मा के अनुसार, गयाजी में पिंडदान के लिए आने वाले तीर्थयात्रियों को प्रथम दिन पुनपुन नदी के तट पर पिंडदान करने का विधान बताया गया है।

इसके बाद श्रद्धालु गयाजी जाकर फल्गु नदी सहित विभिन्न तीर्थ वेदियों पर पिंडदान करते हैं। उन्होंने बताया कि गयाजी में करीब 45 से 48 तीर्थ वेदियां मानी जाती हैं।

इन वेदियों पर अलग-अलग विधान के अनुसार पिंडदान किया जाता है। लेकिन पुनपुन को इस धार्मिक यात्रा का प्रथम पड़ाव माना जाता है।

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च्यवन ऋषि की तपस्या से जुड़ी है पौराणिक कथा

पुनपुन नदी को लेकर एक पौराणिक कथा महर्षि च्यवन से जुड़ी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, च्यवन ऋषि ने ब्रह्मदेव से पूछा था कि मृत्यु के बाद प्राणियों को मोक्ष कैसे प्राप्त हो सकता है।

इसके बाद उन्हें तपस्या करने की सलाह दी गई। कथा के अनुसार, च्यवन ऋषि घने जंगल में तपस्या करने लगे। वहां उन्हें जल नहीं मिला। उन्होंने अपने पसीने को कमंडल में एकत्र करना शुरू किया।

कमंडल बार-बार गिरने से जल नीचे बहता रहा। इसी दौरान उनके मुख से ‘पुनः-पुनः’ शब्द निकला। इसके बाद वहां से नदी प्रवाह‍ित होने लगी। धार्मिक मान्यता में इसी कथा को पुनपुन नदी के नामकरण से जोड़ा जाता है।

तब ब्रह्माजी ने कहा कि इस स्‍थान पर ही पितरों के लिए पहला पिंडदान होगा। उन्‍होंने कहा 'पुनः पुनीते विख्यात: पृतनाम मोक्ष्दायम'। अर्थात इस नदी पर पिंडदान करने से मोक्ष मिलता है। 

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शास्त्रों में ‘आदि गंगा’ के रूप में उल्लेख की मान्यता

पुनपुन नदी को लेकर धार्मिक ग्रंथों में भी उल्लेख की मान्यता बताई जाती है। कहा जाता है क‍ि पद्म पुराण में पुनपुन को आदि गंगा के रूप में वर्णित किया गया है। गया से पहले पुनपुन में तर्पण करना शास्त्र सम्मत माना जाता है।

उनके अनुसार, पुनपुन को मोक्षदायिनी नदी के रूप में भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यहां पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्रीराम से भी जुड़ी है पुनपुन की मान्यता

रवि क‍िशन त‍िवारी बताते हैं कि पुनपुन घाट की महत्ता त्रेतायुग से जुड़ी मानी जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीराम ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए सबसे पहले इसी नदी के तट पर पिंडदान किया था।

इसके बाद वे गयाजी गए। इसी मान्यता के कारण पुनपुन को गयाजी की धार्मिक यात्रा का पहला पड़ाव और मोक्ष का प्रथम द्वार कहा जाता है।

झारखंड से निकलकर पटना के पास गंगा में मिलती है पुनपुन

भौगोलिक रूप से पुनपुन नदी झारखंड के पलामू क्षेत्र के छोटानागपुर पठार से निकलती है और बिहार में बहते हुए पटना जिले के फतुहा के पास गंगा नदी में मिलती है।

धार्मिक आस्था और पौराणिक कथाओं के कारण पितृपक्ष के दौरान इसके घाटों पर भी श्रद्धालुओं की विशेष गतिविधि देखने को मिलती है।

गयाजी में पिंडदान की परंपरा सदियों पुरानी है। पितृपक्ष में यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पुनपुन का पड़ाव इस धार्मिक यात्रा को एक अलग महत्व देता है। 

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