घूंघट से बाहर निकलकर बनीं 'बैंक वाली दीदी', भोजपुर की अर्चना हर महीने कमाती हैं 25 हजार रुपये
पीरो प्रखंड की अर्चना कुमारी, जो पहले घर की चारदीवारी तक सीमित थीं, अब 'बैंक वाली दीदी' के नाम से ...और पढ़ें

सीएसपी में बैठीं अर्चना कुमारी। जागरण
HighLights
अर्चना कुमारी ने जीविका समूह से जुड़कर जीवन बदला।
ग्राहक सेवा केंद्र चलाकर 'बैंक वाली दीदी' के रूप में पहचान बनाई।
हर महीने 25 हजार रुपये कमाकर आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनीं।
राणा अमरेश सिंह, आरा। पीरो प्रखंड के एयार गांव की अर्चना कुमारी की दुनिया घर की चारदीवारी, चौका-चूल्हा और घूंघट तक सिमटी थी। घर की जिम्मेदारियां थीं। दो बच्चों की परवरिश करनी थी।
पति की आमदनी से साधन सीमित थे और बैंक में परिवार का खाता तक नहीं था। अर्चना ने परिस्थितियों के सामने हार मानने से इनकार कर दिया।
उन्होंने अपनी जिंदगी की दिशा बदलने का फैसला किया। आज वही अर्चना बिहार ग्रामीण बैंक की सेवा केंद्र चलाती हैं और क्षेत्र में ‘बैंक वाली दीदी’ के नाम से जानी जाती हैं।
घर की चारदीवारी तक सीमित थी जिंदगी
उनकी पहचान अब घर तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे इलाके में है। दो बेटे हैं, जो शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। अर्चना के जीवन में बदलाव की शुरुआत वर्ष 2017 में हुई।
वह पार्वती जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। समूह की बैठकों और गतिविधियों से उन्हें घर की दहलीज से बाहर निकलने का अवसर मिला।
उनके भीतर आत्मनिर्भर बनने की इच्छा मजबूत हुई। जीविका से जुड़कर उन्होंने बैंक में अपना खाता शुरू किया। वर्ष 2018 में उन्हें ग्राहक सेवा केंद्र (CSP) चलाने की जानकारी मिली।
उन्होंने इसे अपनी जिंदगी बदलने का मौका माना। शिवा जीविका महिला ग्राम संगठन ने दक्षिण बिहार ग्रामीण बैंक का ग्राहक सेवा केंद्र चलाने के लिए उनका चयन किया।
जीविका से जुड़कर 2017 में खोला बैंक में जनधन खाता
बैंक में साक्षात्कार के बाद उन्हें तीन दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण दिया गया। बैंक खाता खोलने, आधार से रुपये की जमा-निकासी और बीमा जैसी सेवाओं की जानकारी मिली।
केंद्र शुरू करने के लिए संगठन ने उन्हें 70 हजार रुपये दिए। इसमें 50 हजार रुपये ऋण और 20 हजार रुपये अनुदान था।
इसी पूंजी का उन्होंने सही इस्तेमाल किया और इससे लैपटाॅप, प्रिंटर और फिंगरप्रिंट मशीन खरीदे। 23 मई 2018 को पीरो में ग्राहक सेवा केंद्र की शुरुआत हुई। यह सिर्फ रोजगार की शुरुआत नहीं थी, आत्मविश्वास की नई उड़ान भी थी।
मेहनत ने दिलाई नई पहचान
आज 32 वर्षीय अर्चना के केंद्र से हर महीने डेढ़ करोड़ रुपये से अधिक का बैंकिंग लेन-देन हो रहा है। इससे उन्हें करीब 25 हजार रुपये प्रतिमाह की आमदनी हो रही है।
गांव और आसपास के लोगों को बैंकिंग सेवाओं के लिए दूर नहीं जाना पड़ता। जीविका समूहों की महिलाएं भी उनके केंद्र पर पहुंचती हैं। बैंक के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है।
अर्चना अब महिलाओं को बैंकिंग और बीमा सेवाओं की जानकारी भी देती हैं। अर्चना बताती हैं कि जीविका और महिलाओं के लिए सरकारी की अन्य योजनाओं ने उन जैसी महिलाओं को जीवन बेहतर बनाने का मौका दिया है, कभी घर की जिम्मेदारियों में उलझी थी, लेकिन अब दूसरों के आर्थिक कामों में मदद करती हूं।
