कभी भाप इंजन और छोटी लाइन से थी पहचान, अब 700 करोड़ से बदलेगी आरा-सासाराम रेलखंड की तस्वीर; दोहरीकरण से बढ़ेगी रफ्तार
भोजपुर की आरा-सासाराम रेल लाइन का इतिहास भाप इंजन और छोटी पटरी से शुरू होकर अब दोहरीकरण तक पहुँच गया ...और पढ़ें

1978 में बंद हो गया छोटी लाइन का परिचालन
HighLights
700 करोड़ रुपये से आरा-सासाराम रेलखंड का दोहरीकरण होगा।
इससे यात्री और मालगाड़ियों के परिचालन में तेजी आएगी।
क्षेत्र के व्यापार, शिक्षा और स्वास्थ्य को मिलेगा बढ़ावा।
संवादसूत्र, उदवंतनगर (भोजपुर)। भोजपुर की रेल यात्रा ने बीते करीब एक सौ वर्षों में लंबा सफर तय किया है। कभी दो फीट छह इंच की छोटी पटरी पर भाप इंजन से चलने वाली ट्रेनें इस क्षेत्र की पहचान थीं। फिर छोटी लाइन बंद हुई और ब्रॉड गेज ने रेल संपर्क को नई दिशा दी। अब आरा-सासाराम रेलखंड के दोहरीकरण की तैयारी से इस ऐतिहासिक रेलमार्ग के विकास का अगला अध्याय शुरू होने जा रहा है।
करीब 100 किलोमीटर लंबे इस रेलखंड के दोहरीकरण पर लगभग 700 करोड़ रुपये खर्च होने की योजना है। इससे यात्री ट्रेनों के साथ मालगाड़ियों के परिचालन को भी गति मिलने की उम्मीद है।
कभी बसों और टांगे से होती थी ट्रेनों की होड़
भोजपुर में रेल परिवहन का इतिहास काफी पुराना है। वर्ष 1972 में भोजपुर जिला तत्कालीन शाहाबाद जिले से अलग होकर अस्तित्व में आया था।
उस समय आरा-सासाराम मुख्य सड़क के किनारे नैरो गेज रेललाइन गुजरती थी। छोटी लाइन पर चलने वाली ट्रेन और सड़क पर दौड़ती बसों के बीच आगे निकलने की होड़ लोगों के लिए कौतूहल का विषय होती थी। कभी-कभार टांगे भी इस मुकाबले में शामिल दिखते थे। उस दौर में मार्टिन रेलवे को शाहाबाद की लाइफलाइन माना जाता था।
1909 में शुरू हुई थी मार्टिन रेलवे परियोजना
आरा-सासाराम रेलखंड पर 19 अक्टूबर 1909 को मार्टिन रेलवे परियोजना की शुरुआत हुई थी। वर्ष 1914 में इस मार्ग पर छोटी लाइन की ट्रेनें दौड़ने लगीं।
करीब 100 किलोमीटर लंबे रेलखंड पर दो फीट छह इंच यानी लगभग 76 सेंटीमीटर चौड़ी पटरी बिछाई गई थी। भाप इंजन से चलने वाली ट्रेनों के इस मार्ग पर कुल 15 स्टेशन थे। यात्रियों के आवागमन के साथ धान और दूसरे सामान की ढुलाई में भी इस रेललाइन की अहम भूमिका थी।
1978 में बंद हो गया छोटी लाइन का परिचालन
समय के साथ छोटी लाइन की सीमाएं सामने आने लगीं। धीमी रफ्तार और बढ़ते घाटे के कारण 15 फरवरी 1978 को आरा-सासाराम रेलखंड पर छोटी लाइन का परिचालन बंद कर दिया गया।
इसके बाद क्षेत्र के लोगों को बेहतर रेल सुविधा के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। छोटी लाइन का बंद होना भोजपुर के रेल इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।
2009 में ब्रॉड गेज पर दौड़ी पहली ट्रेन
यात्रियों की बढ़ती संख्या और बेहतर रेल संपर्क की जरूरत को देखते हुए वर्ष 2006-07 में ब्रॉड गेज निर्माण का काम शुरू किया गया।
फरवरी 2009 में इस रेलखंड पर पहली बार बड़ी लाइन की ट्रेन दौड़ी। इसके बाद आरा-सासाराम के अलावा भभुआ, डेहरी, गया, धनबाद, बोकारो और रांची जैसे शहरों तक रेल संपर्क बेहतर हुआ। ब्रॉड गेज ने इस क्षेत्र के यात्रियों को लंबी दूरी की यात्रा के नए विकल्प दिए।
700 करोड़ से दोहरीकरण, ट्रेनों का दबाव होगा कम
अब आरा-सासाराम रेलखंड के दोहरीकरण की योजना से रेल यातायात को नई गति मिलने की उम्मीद है। करीब 100 किलोमीटर लंबे इस मार्ग पर दोहरी लाइन बनने से एकल रेललाइन पर ट्रेनों का दबाव कम होगा।
ट्रेनों के संचालन, समय प्रबंधन और जरूरत पड़ने पर डायवर्सन में भी सहूलियत मिलेगी। इससे यात्रियों को बेहतर परिचालन व्यवस्था का लाभ मिल सकता है।
चौसा थर्मल पावर परियोजना को भी मिलेगा लाभ
दोहरीकरण से मालगाड़ियों की आवाजाही बढ़ाने में मदद मिलेगी। इसका लाभ चौसा थर्मल पावर परियोजना को भी मिलने की उम्मीद है, क्योंकि माल ढुलाई अधिक सुगम हो सकेगी।
इसके अलावा प्रस्तावित बलिया-आरा रेललाइन से जुड़ाव होने पर लंबी दूरी की ट्रेनों के विस्तार और वैकल्पिक रेल मार्ग की संभावनाएं बढ़ेंगी।
शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार को मिलेगी नई कनेक्टिविटी
बेहतर रेल संपर्क का असर केवल यात्रा तक सीमित नहीं रहेगा। आरा-सासाराम रेलखंड के दोहरीकरण और बलिया-आरा रेललाइन से जुड़ाव से क्षेत्र के व्यापार, कृषि और रोजगार को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए दूसरे शहरों तक पहुंच भी आसान हो सकती है। छोटी लाइन से ब्रॉड गेज और अब दोहरीकरण तक का यह सफर भोजपुर के रेल विकास की बदलती तस्वीर को दिखाता है।
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