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भागलपुर [कौशल किशोर मिश्र]। मॉर्निंग कोर्ट होने के कारण अधिवक्ताओं की कम संख्या में ही सही सुबह कचहरी परिसर में आवाजाही शुरू हो गई थी। सुबह दस बजे के करीब कई अधिवक्ता एक जगह बैठ गए। भीड़भाड़ कम रहने के कारण अधिवक्ताओं के बीच लोकसभा चुनाव को लेकर चर्चा शुरू हो गई। अधिवक्ताओं के बीच होने वाली चर्चाओं का निचोड़ यही था कि कोई प्रत्याशी या दल अधिवक्ता हित को लेकर कभी उदार नहीं रहा है।

चुनावी चर्चा में अधिकांश वकीलों की यही राय सामने आई कि लोकसभा का चुनाव चाहे 2014 का हो या 2019 का। असली मुद्दे चुनावी शोर में दब जाते हैं। चर्चा के दौरान बातें नेताओं की टीका-टिप्पणी और भावनात्मक मुद्दे की होने लगती है। वरीय अधिवक्ता कामेश्वर पांडेय का कहना था कि देश का आम चुनाव मुद्दे पर आधारित हो। व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी या देश विरोधी बयानों पर आधारित ना हो। स्वस्थ्य लोकतांत्रिक परंपरा में चुनाव हो, जिसका संदेशा विश्व के देशों में बेहतर जाए।

अधिवक्ता भवानी शंकर मिश्रा का कहना था कि चुनाव स्वस्थ्य परंपरा में हो। देश विकास पथ पर है तो चुनाव में उसका संदेशा भी दुनियां को सही जाए। अधिवक्ता मो.अब्दुल दरजात फहीमुद्दीन खां बबलू का कहना था कि चुनाव में असल मुद्दे पर अब हो कहां रहे हैं। लोग चुनाव के समय भावना में बह जाते हैं या भटका दिए जाते हैं। अधिवक्ता आनंद श्रीवास्तव की राय थी कि लोकसभा का चुनाव असल मुद्दे पर ही लड़ा जाना चाहिए। वह मुद्दा है जनता के हित का, लेकिन चुनाव के नजदीक आते ही मुद्दे दब जाते हैं। अधिवक्ता वीरेश प्रसाद मिश्रा की माने तो आम चुनाव में देशहित की बात हो। चुनाव में अधिवक्ताओं के हितों का भी ख्याल रखा जाए ताकि वकीलों का कल्याण हो।

अधिवक्ता विनोद यादव की माने तो आम चुनाव में मुद्दे जो हों लेकिन चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से हो। जनता की बातों को सभी दल प्राथमिकता में रखे। अधिवक्ता कल्याण की बात भी हो। अधिवक्ता नारायण पाठक की राय थी कि अधिवक्ता समाज के लिए चुनाव में किसी दल या नेताओं की ओर से कोई ठोस पहल नहीं होती है। असल मुद्दे गायब हो जाते हैं और दूसरे मुद्दे पर आरपार की लड़ाई लड़ी जाती। अधिवक्ता विजय कुमार ने कहा कि आम चुनाव में जनहित के मुद्दे पर ही राजनीतिक दलों को केंद्रित रहना चाहिए। अधिवक्ता उमेश पांडेय ने कहा कि आम जन और अधिवक्ता समाज के कल्याण का मुद्दा चुनाव में गायब हो जाता है। अधिवक्ता विकास चंद्र चौधरी की राय थी कि असल मुद्दे पर चुनाव बीते कई आम चुनावों में नहीं हुए। मतदान नजदीक आते ही लड़ाई दूसरे मुद्दे पर होने लगती है।

Posted By: Dilip Shukla

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