कटिहार (नंदन कुमार झा): मानसून की आहट के साथ ही जिले की बड़ी आबादी के लिए परेशानी शुरू हो जाती है। गंगा, महानंदा और कोसी के गोद में बसे कटिहार जिले में हर साल बड़ी आबादी आवागमन की समस्या झेलती है। मुख्य रूप से तटबंध के भीतर बसे गांव के वांशिदों के लिए हर वर्ष आवागमन की दुरूह समस्या झेलना लोगों की नियती बन चुकी है। मानसून की शुरूआत के बाद ही जिले के चार दर्जन गांव में आवागमन की गंभीर समस्या शुरू हो जाती है। वर्षों से चली आ रही इस समस्या के स्थाई निदान का अबतक स्थाई प्रबंध नहीं हो पाया है।

बता दें कि जिले के अमदाबाद, मनिहारी, आजमनगर, कदवा, बरारी आदि प्रखंड में यह समस्या गंभीर होती है। इसको लेकर गांव के लोग मुख्य रूप से गर्भवती महिलाओं सहित नई बहूओं को चार माह के लिए मायके भेज देते हैं। चार माह तक घर की महिलाओं को प्रवास पर भेजने का दर्द यहां के लोगों में टीस की तरह चुभता रहा है।

इन गांव में गंभीर होती है समस्या :

मानसून की आहट के साथ ही अमदाबाद प्रखंड के धन्नी टोला, गोला घाट, मेघू टोला, युसूफ टोला, पोड़ाबाद, झब्बू टोला, भगवान टोला, भादो टोला, आजमनगर प्रखंड के औलिया, बेलंदा, गर्रा, सोलकंदा, कदवा प्रखंड के तेतलिया, धनगामा, धपरसिया, चौनी, गोपीनगर सहित मनिहारी व बरारी प्रखंड के कई गांव में समस्या गंभीर होती है। मानसून की आहट के साथ ही यहां के लोग डेंगी नाव को तैयार करना शुरू कर देते हैं। इसके साथ ही टीन के नाव को दैनिक आवागमन के लिए उपयोग किया जाता है। यह समस्या यहां वर्षों से चली आ रही है। इसको लेकर इन गांव के लोग मानसून शुरू होते ही घर की महिलाओं सहित बुर्जूर्गों को सुरक्षित स्थान पर भेज देते हैं।

मानूसन की आहट से ताजा हो जाता है दर्द :

मानसून की आहट से ही इन गांव के लोगों की धड़कने बढ़ने लगती है। बारिश के साथ ही महानंदा में पानी उतरते ही ये लोग महिलाओं को सुरक्षित स्थान पर भेज देते हैं। यद्यपि कहीं न कही उनके मन में अपने से बिछड़ने की टीस बरकरार रहती है। अगर समस्या का निदान नहीं हुआ तो कही और पलायन करना उनकी मजबूरी बन जाएगी।

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केस स्टडी

अमदाबाद के रहने वाले महेंद्र ¨सह ने बताया कि गत वर्ष बाढ़ के दौरान उनकी पत्नी गर्भवती थी। इसके कारण बरसात शुरू होते ही उन्होंने परिवार और बच्चों को पत्नी के घर भेज दिया था। शुक्र है कि बाढ़ के दौरान उनका परिवार यहां नहीं था। नहीं तो समय पर प्रसव कराना उनके लिए मुश्किल साबित होता।

केस स्टडी

आजमनगर के गर्रा निवासी विनोद शर्मा की पत्नी गर्भवती हैं। उन्होंने कहा कि बरसात के बाद यहां आवागमन की समस्या गंभीर हो जाती है। डेंगी नाव के सहारे आवागमन करना उनके लिए परेशानी होगी। वे अपनी पत्नी और बच्चे को बरसात के पूर्व मायके भेजने की तैयारी कर रहे हैं।

केस स्टडी

अमदाबाद के रहने वाले पांडव ¨सह ने कहा कि बरसात के दिनों में आवागमन की गंभीर समस्या होती है। इसके लिए हर वर्ष मानसून की आहट के साथ ही चार माह के लिए वे अपनी पत्नी और बच्चों को पश्चिम बंगाल भेज देते हैं। इस दौरान बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है। लेकिन अब तो समस्या झेलना उनकी नियती बन चुकी है।

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नाव पर भी होता है महिलाओं का प्रसव

यहां नाव पर भी होता है महिलाओं का प्रसव

कटिहार : बाढ़ के दौरान अस्पताल लाने के क्रम में कई बार नाव पर ही महिलाओं का प्रसव कराया जाता है। इस तरह का वाकया लगभग हर वर्ष सामने आता रहा है। वर्ष 2016 में मनिहारी के बौलिया निवासी मोजीबुर रहमान की पत्नी नसीमा खातून का प्रसव अस्पताल लाने के दौरान डेंगी नाव पर ही हुआ था। यद्यपि स्वास्थ्य कर्मियों की सूझबूझ के बाद उसका तत्काल उपचार किया गया था। वही वर्ष 2017 की बाढ़ के दौरान धुरियाही निवासी राजकुमार मंडल की पत्नी कौशल्या देवी ने स्वास्थ्य केंद्र लाने के दौरान नाव पर ही बच्चे को जन्म दिया था। इस तरह की विवशता के कारण लोग गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित स्थान पर भेजने को मजबूर रहते हैं।

Posted By: Jagran

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