सुपौल, जेएनएन। शहर की सफाई मामले में नगर परिषद अव्वल है। इसे लेकर कई बार नगर परिषद पुरस्कृत भी हो चुकी है लेकिन कंचरा निस्तारण की व्यवस्था नगर परिषद के पास नहीं हैं। ऐसे में शहर की सफाई कर निकलने वाले कचरे को शहर के बाहर फेंका जाता है। कचरों के ढेर में आग लगा देने से उससे धुआं उठता रहता है जबकि जलते कचरा का धुएं से पराली के धुएं से अधिक खतरा है। जहां ये धुएं स्वास्थ्य के लिए अहितकर हैं वहीं कुहासा को घनीभूत कर ये धुआं ²श्यता को कम कर देते हैं।

कृषि प्रधान जिला होने के बाद भी यहां के किसानों को खेतों में पराली जलाने की आदत नहीं है। हालांकि मशीनीकरण के दौर में कंबाइन से धनकटनी होने के कारण कुछ जगहों पर खेतों में लगे धान के अवशेष को जलाया जाना शुरू हुआ है। अन्यथा धान के पुआल का उपयोग यहां मवेशी चारा के रूप में होता है। गरीबी में गुजर करनेवाले लोग अपने घरों की छौनी भी इससे करते हैं। यह दीगर बात है कि शाम के समय अलाव जलाने में लोग थोड़ा-बहुत पुआल जलाते हैं। वह इतना अधिक नहीं होता कि पर्यावरण को बहुत अधिक नुकसान हो। गंवई इलाके में भले ही पराली नहीं जलाए जाते हों लेकिन शहरी क्षेत्र में कचरों के ढेर में लगी आग और उससे उठता धुआं अमूमन उन जगहों पर देखा जा सकता है जहां नगर परिषद द्वारा कचरा फेंका जाता है।

साफ-सफाई मामले में नगर परिषद यूं अव्वल नहीं है बल्कि इसके पीछे बड़ा कारण यह है कि शहर में दो बार सुबह और शाम के समय झाडू लगाए जाते हैं। कचरा निस्तारण की व्यवस्था नहीं रहने के कारण इससे जमा हुए कचरे को शहर के बाहर इंजीनियरिंग कॉलेज के समीप, सुपौल-ङ्क्षसहेश्वर रोड के नहर के पास, जगन्नाथ मिश्र इंटर कॉलेज के समीप, बीएसएस कॉलेज के पीछे आदि स्थानों पर फेंका जाता है। ये तमाम स्थान वे हैं जिसे शहर का प्रवेश द्वार कहा जाता है।

विभिन्न जगहों से सुपौल आने वाले लोगों को इन होकर आना पडता है। यानी शहर में प्रवेश करने से पहले कचरा लोगों का स्वागत करता है। खैर जब इन स्थानों पर कचरा फेंका जाता है तो इस ढेर में कोई न कोई आग लगा देता है। इन ढेरों से हमेशा धुआं उठता रहता है। शहर से निकाले गए कचरे में प्लास्टिक समेत कई अन्य ऐसी चीजें होती हैं जिससे निकलने वाले धुएं में कई हानिकारक गैस शामिल होती है।

नगर परिषद द्वारा पूर्व में गीला कचरा और सूखा कचरा अलग-अगल उठाव की योजना तैयार की गई थी। इससे खाद बनाया जाना प्रस्तावित था जो अबतक अमलीजामा नहीं पहन पाया है। नतीजा है कि साफ-सुथरे शहर में रहनेवाले शहरियों को यही हवा सांस में लेनी पड़ती है।

 

Edited By: Abhishek Kumar