भागलपुर [कौशल किशोर मिश्र]। बंजारों की खुशहाल जिंदगी को कोरोना वायरस की दहशत ने काली नजर लगा दी है। इनकी खुशहाली को ग्रहण लग गया है। बंजारों की एक ऐसी ही टोली कजरैली के लक्षमिनियां मोड़ के पास लॉकडाउन में फंसी है। टोली में मर्द, औरत और बच्चों सहित कुल मिलाकर सौ लोग हैं। इनके समक्ष भोजन जुटाना चुनौती बन गई है। पहले टोली जिस इलाके में डेरा डालती थी, वहां कुछ न कुछ काम मिल जाता था। कोई गांव-शहर घूमकर कान और घाव के मवाद साफ करता तो कोई जड़ी-बूटी वाली दवाएं बेचता था। घुटने में दर्द हो, एक्जिमा हो, ये सिंघ लगा कर उसे ठीक करते थे।

महिलाएं और बच्चे घूम-घूम कर अनाज मांग कर ले आती थीं। जिंदगी की गाड़ी रोज मजे से कट रही थी। आज यहां कल वहां, हमेशा गतिशील रहते थे। अब लॉकडाउन की वजह से कजरैली में ही यह टोली मुख्य मार्ग से सटे आम के बगीचे में लगे डेरा में कैद हो गई है। डेरे का राशन समाप्त हो गया है।

टोली के बुजुर्ग सिनेष राठौर कहते हैं कि अभी स्थिति यह है कि किसी गांव में उन्हें देखते ही लोग शोर मचा कर भगा दे रहे हैं। बोलते हैं कि भागो, कोरोना फैल जाएगा। अब तो उनकी टोली को भोजन के लाले पड़ गए हैं। कजरैली के समीप एक गांव के मुखिया ने एक-एक किलो अनाज भी दिया, जो इनके लिए उंट के मुंह में जीरा जैसा साबित हुआ।

टोली में शामिल बंजारा अंजियाल राठौर कहते हैं कि कान की सफाई, घाव की सफाई, घुटने की दर्द, बात, सिंघ लगा कर मवाद निकाले, पेड़ों में लगे मधुमक्खी के छत्ते से मधु उतारने का उनका पुश्तैनी रोजगार है। कोरोना के भय से उन्हें अब लोग पास नहीं फटकने देते। एक जगह से दूसरी जगह डेरा भी लगाने नहीं जा सकते। हम तबाह हैं। हम लुक्खी, पड़ोकी, बनमुर्गी आदि का गुलेल से शिकार कर सब्जी की जुगाड़ कर लेते थे। अब तो कहीं जाने पर भी रोक लगी है। हम क्या खाएं। हमारी जिंदगी नरक बन चुकी है। टोली में शामिल कविता देवी, शिल्पी देवी, क्रांति देवी, मैतुन देवी, दिनेश राठौर, कृष्णा आदि कहते हैं कि रात को क्या खाएंगे उन्हें भी पता नहीं। सिमरिया निवासी मुहम्मद अनवर ने बताया कि अब तक हमारी सुध लेने कोई नहीं आया है। बंजारों की यह टोली बांका के समुखिया मोड़ ककना से चलकर मार्च में कजरैली पहुंची थी।

Posted By: Jagran

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