भागलपुर [नवनीत मिश्र]। श्रावणी मेला सालों से नारी सशक्तीकरण को बढ़ावा देता आ रहा है। सुल्तानगंज से देवघर तक की 110 किलोमीटर पैदल यात्रा से जुड़ा श्रावणी मेला न केवल गांव घरों की चहारदिवारी में कैद महिलाओं को कुछ भी कर गुजरने के विश्वास से भर देता है, बल्कि महिलाओं के लिए कई तरह रोजगार के अवसर उपलब्ध करा कर भी उन्हें सशक्त बनाता है। यह महिलाओं को सशक्त बनाकर नारी सशक्तीकरण की नींव को मजबूत करती है। धार्मिक आख्यानों में बाबा भोले के साथ माता पार्वती का महत्व जगजाहिर है। इस मेले में भी नारी शक्ति की खासी भागीदारी रहती है। चाहे वह रोजगार का क्षेत्र हो या फिर सेवा का। 35 वर्षों से सावन महीने के हर रविवार को डाक बम जा रही कृष्णा बम को देखकर महिलाएं भी बाबा को जलाभिषेक के लिए प्रेरित हो रही हैं। मेले में नारी सम्मान का अद्भूत नजारा दिखता है।

श्रावणी मेले में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। हाल के वर्षों में भारी संख्या में महिलाएं कांवरिया के रूप में बाबा वैद्यनाथ को दर्शन के जा रही हैं। सामान्य कांवरिया में महिलाओं की संख्या एक चौथाई अधिक रहती है।

हर रविवार को हजारों महिलाएं उठाती हैं जल, 24 घंटे में पहुंचती है देवघर

24 घंटे में देवघर पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या भी प्रत्येक रविवार को दस हजार से अधिक रहती है। मुजफ्फरपुर की कृष्ण देवी, सीतामढ़ी की रंजना आदि महिलाएं प्रत्येक रविवार को डाक बम के रूप में देवघर जा रही हैं। दांडी बम के रूप में भी महिलाएं बाबा को दर्शन के लिए जा रही हैं। ऐसा नहीं है कि अपने संगी-साथी, पति, भाई, रिश्तेदार के साथ ही महिलाएं सुल्तानगंज से देवघर पैदल यात्रा करती हैं। हजारों की संख्या महिलाएं अकेले घर से चलकर देवघर की ओर रवाना होती है। कुमरसार के समीप पैदल यात्रा कर रही शोभा देवी, रजनी देवी, कोमल, आरती आदि महिलाओं ने बताया कि पिछले कई वर्षों से अकेले देवघर जा रही है।

108 किमी का सफर बिना भय के होती है पूरा

सुल्तानगंज से देवघर जाने अकेले जाने में भय तो रहती है, लेकिन बाबा के भरोसे चार दिनों में 108 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर लेते हैं। दांडी बम के रूप में देवघर जा रही अनिता देवी के बताया कि 15 दिनों जिलेबिया तक पहुंचे हैं। देवघर पहुंचने में दस दिन और लगेंगे। दस दिन पहले तक डर महसूस हो रहा था, अब नहीं लग रहा है। सुल्तानगंज ही नहीं पूरे कांवरिया मार्ग पर हजारों की संख्या में महिलाएं दुकान चला रही हैं। कोई चाय-नास्ते की दुकान चला रही है तो कोई पूजा-पाठ सामग्री बेचने की। सुल्तानगंज सीढ़ी घाट के रास्ते में जल पात्र बेचने वाली कुसुम ने बताया कि पिछले 25 वर्षों से दुकान चला रहे हैं। दिन में बेटियां दुकान चलाती हैं और रात में हम दुकान पर बैठते हैं। सावन और भादो में डिब्बे की अच्छी बिक्री हो जाती है। सुल्तानगंज में कांवर की कई ऐसी दुकानें हैं, जहां दिन में महिलाएं बैठती हैं और रात में पुरुष। श्रावणी मेले में महिलाएं और पुरुष का भेदभाव मिट जाता है।

शिवभक्ति का पर्याय बन चुकीं कृष्णा बम

शिवभक्ति का पर्याय बन चुकीं मुजफ्फरपुर निवासी कृष्णा बम के बारे में प्राय: लोग जानते हैं कि वह सावन की प्रत्येक सोमवार को डाक बम बनकर बाबा के दरबार में जलाभिषेक करती हैं। सभी 12 च्योतिर्लिंगों का दर्शन पूजन कर चुकीं कृष्णा बम 39 वर्ष से निरंतर बाबाधाम की यात्रा कर रही हैं। शादी के बाद एक दिन उन्हें स्वप्न आया जिसमें सुल्तानगंज से सूईया का रास्ता दिखाई दिया। उन्होंने जाने की जिद पकड़ ली। पति सहित ससुराल के अन्य लोग इस फैसले से खुश नहीं थे, विरोध के बाद भी कृष्णा अकेले मौर्य एक्सप्रेस ट्रेन से सुल्तानगंज पहुंच गईं। कहा कि उस समय के हालात समझे जा सकते हैं, उसपर से मैं अकेली महिला। लेकिन मैं रात में ही जल उठाकर चल दी। वीरान रास्ते पर चार-पांच डाक बम दिख जाते थे। उस समय इतनी सुविधा भी नहीं थी। सुबह 10 बजे बाबा का जलार्पण करने के बाद कृष्णा बम ने सावन की हर सोमवारी को आने का जो संकल्प लिया वह आज भी अनवरत जारी है। जीवन पर्यंत वह इसे जारी रखने की बात कहती हैं।

 

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Posted By: Dilip Shukla

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