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जिन बच्चों को जन्म नहीं दिया, उनके लिए 40 वर्षों से जिउतिया व्रत रख रहीं पवन देवी; भागलपुर की मां ने मिटाया भेद

Published: Sat, 03 Oct 2026 09:49 PM (IST)

Jitiya Vrat Inspiring Story: पवन देवी, जो स्वयं भागलपुर के रामानंदी देवी हिंदू अनाथालय में पली-बढ़ीं, 40 वर्षों से अनाथ ...और पढ़ें

Jitiya Vrat Inspiring Story: भागलपुर के रामानंदी देवी हिंदू अनाथालय में बच्चों के बीच जिउतिया व्रत रखने वाली 62 वर्षीय पवन देवी।

Jitiya Vrat Inspiring Story: भागलपुर के रामानंदी देवी हिंदू अनाथालय में बच्चों के बीच जिउतिया व्रत रखने वाली 62 वर्षीय पवन देवी।

HighLights

  1. पवन देवी 40 वर्षों से अनाथ बच्चों के लिए जितिया व्रत रखती हैं।

  2. वह स्वयं भागलपुर के रामानंदी देवी अनाथालय में पली-बढ़ी थीं।

  3. यह व्रत बच्चों के प्रति उनके असीम मातृत्व प्रेम को दर्शाता है।

जागरण संवाददाता, भागलपुर। Jitiya Vrat Inspiring Story: ममता जब सांसारिक और रक्त संबंधों की सीमाओं को लांघकर पूरे समाज को अपनी गोद में समेट लेती है, तो वह ईश्वर का रूप बन जाती है। ऐसी ही एक पावन और रोंगटे खड़े कर देने वाली मिसाल भागलपुर के ऐतिहासिक रामानंदी देवी हिंदू अनाथालय में देखने को मिलती है।

करीब 62 वर्ष पहले एक नवजात अनाथ बच्ची के रूप में इसी अनाथालय की दहलीज पर पहुंचीं पवन देवी आज यहां जीवन संवार रहे दर्जनों अनाथ और बेसहारा बच्चों के लिए साक्षात मां बन चुकी हैं। जिन बच्चों को उन्होंने अपनी कोख से जन्म नहीं दिया, उनकी लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए वे पिछले 40 वर्षों से लगातार जीवित्पुत्रिका यानी जिउतिया का कठोर निर्जला व्रत रख रही हैं।

शुक्रवार को नहाय-खाय के साथ उन्होंने अपने इस 40वें व्रत का विधिवत संकल्प लिया। कभी जिस अनाथालय ने बेसहारा पवन को अपनी छत्रछाया देकर जीवन दान दिया था, आज उसी अनाथालय के नौनिहालों के लिए पवन देवी का स्नेह, वात्सल्य और ममता सबसे बड़ा संबल बना हुआ है।

मां की कमी की टीस से उपजा ममता का संकल्प

अपने अतीत के पन्नों को पलटते हुए 62 वर्षीय पवन देवी की आंखें छलक उठती हैं। वे बताती हैं कि जब वे अनाथालय में एक अबोध बच्ची के रूप में रहती थीं, तब हर साल जितिया पर्व पर शहर की बड़ी-बूढ़ी महिलाओं को सज-धजकर विधि-विधान से पूजा करते देखती थीं। कुछ लोग अनाथालय में बच्चों को प्रसाद खिलाने आते थे। तब बाल मन में यह सवाल कौंधता था और वह अपनी मां को ढूंढता था। वे अक्सर सोचती थीं कि काश उनकी भी अपनी मां होती, जो उनके जीवन और दीर्घायु के लिए जिउतिया का उपवास रखती।

अनाथालय के अन्य अनाथ साथियों के सीने में भी ठीक यही पीड़ा और टीस धड़कती थी। उम्र बढ़ने के साथ पवन देवी ने संकल्प लिया कि इस अनाथालय की दहलीज पर आने वाले किसी भी बच्चे को कभी मां के अभाव की यह टीस नहीं सहने देंगी। इसी संकल्प के तहत उन्होंने बिना किसी भेदभाव के सभी अनाथ बच्चों के नाम से जिउतिया का 24 घंटे का निर्जला व्रत उठा लिया।

1987 में अनाथालय से ही हुआ विवाह, पांच बच्चों की हैं मां

पवन देवी का विवाह वर्ष 1987 में अनाथालय प्रबंधन ने ही एक बेटी की तरह विदा कर कराया था। उनके अपने पांच बच्चे हैं, जिनमें से चार की शादी हो चुकी है और वे अपने परिवारों में खुशहाल हैं। इसके बावजूद पवन देवी का अनाथालय से नाता एक पल के लिए भी नहीं टूटा। वे कहती हैं—"इसी अनाथालय ने मुझे जिंदगी, पहचान और संस्कार दिए। यह अनाथालय ही मेरा मायका है और यहां रहने वाला हर बच्चा मेरी अपनी संतान है। जब तक शरीर में सांस है, मैं इन बच्चों के लिए निर्जला व्रत रखूंगी, ताकि इनके सिर से कभी मां का साया कम न हो।"

बरसों तक बिना मानदेय की सेवा

अनाथालय के प्रति पवन देवी का समर्पण इतना गहरा रहा है कि करीब 13 वर्ष पूर्व जब संस्था में उनकी औपचारिक नियुक्ति हुई, उससे पहले वे वर्षों तक बिना एक पैसा पारिश्रमिक लिए दिन-रात बच्चों की निस्वार्थ सेवा करती रहीं। संस्था के सचिव शरजानंद मिश्र बताते हैं कि पवन देवी का इस अनाथालय से केवल कर्मचारी का नहीं, बल्कि गहरा भावनात्मक और आत्मीय रिश्ता है।

1925 से बेसहारा का सहारा है संस्था

गौरतलब है कि रामानंदी देवी हिंदू अनाथालय की स्थापना वर्ष 1925 में की गई थी। करीब एक सदी (100 वर्ष) से यह संस्था समाज के उपेक्षित, लावारिस और अनाथ बच्चों को संरक्षण, उच्च शिक्षा और मानवीय संस्कार देकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का अनुकरणीय कार्य कर रही है। पवन देवी का यह 40 वर्षों का निर्जला तप इस संस्था की मानवीय गरिमा को और ऊंचा उठाता है।

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