'मेरी प्यारी लाडो'... अब बेटियों की सलामती के लिए भी महिलाएं रख रहीं जिउतिया का निर्जला व्रत; टूटी रूढ़िवादी सोच
Jitiya Vrat For Daughters : अकबरनगर, भागलपुर में माताएं अब अपनी बेटियों की लंबी उम्र और सुखद भविष्य के लिए ...और पढ़ें

Jitiya Vrat For Daughters : बेटियों के लिए भी जिउतिया का निर्जला व्रत।
संवाद सूत्र, अकबरनगर (भागलपुर)। Jitiya Vrat For Daughters : “जिउतिया के दिनमा, अइले जिमूतवाहन, मइया करै छै पूजा, ललना रहै चिरजीवन...” आश्विन मास में लोकआस्था के महापर्व जिउतिया के आगमन के साथ ही गांवों से लेकर कस्बों तक यह पारंपरिक लोकगीत गूंजने लगता है। सदियों से गाए जा रहे इन गीतों और धार्मिक मान्यताओं में माताएं अपने पुत्र की लंबी उम्र और आरोग्य के लिए 24 घंटे का निर्जला व्रत रखती आई हैं।
लेकिन बदलते वक्त के साथ अब समाज की सोच में एक सकारात्मक और क्रांतिकारी बदलाव साफ दिखाई देने लगा है। बेटा-बेटी के बीच का भेद मिटाते हुए भागलपुर जिले के अकबरनगर क्षेत्र में दर्जनों माताएं अब अपनी 'बिटिया रानी' की दीर्घायु, सलामती और सुखी भविष्य के लिए भी पूरी निष्ठा से जिउतिया का कठिन निर्जला व्रत रख रही हैं।
अकबरनगर नगर पंचायत और आसपास के इलाकों में ऐसी कई जागरूक माताएं हैं, जिन्होंने इस पितृसत्तात्मक धारणा को पीछे छोड़ दिया है कि यह व्रत केवल पुत्रों के लिए ही होता है।
जब बेटा और बेटी समान, तो पर्व की कामना सीमित क्यों?
ऐसी ही माताओं में से एक हैं अकबरनगर नगर पंचायत के श्रीरामपुर (वार्ड संख्या 8) निवासी रीमा कापरी। रीमा कापरी बताती हैं कि उनकी दो बेटियां हैं और वे दोनों बेटियों की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और जीवन में सफलता की कामना के लिए हर साल नियम-निष्ठा के साथ यह कठिन व्रत करती हैं।
उन्होंने बताया कि जिउतिया से तीन दिन पहले से ही उनकी दोनों बेटियां भी पर्व के उत्साह में डूब जाती हैं। घर की लिपाई-पुताई, साफ-सफाई से लेकर बाजार से पूजन सामग्री लाने तक में बेटियां मां का पूरा हाथ बंटाती हैं।
रीमा कापरी का दो टूक कहना है—"आज जब समाज में बेटा और बेटी हर स्तर पर एक समान हैं, बेटियां हर क्षेत्र में माता-पिता का नाम रोशन कर रही हैं, तो फिर किसी पावन पर्व की मंगलकामना केवल पुत्र तक ही सीमित क्यों रहे? हमारी बेटियां ही हमारा अभिमान हैं।"
बदलते समाज की प्रेरक तस्वीर: मुख्य तथ्य एक नजर में
स्थान: अकबरनगर नगर पंचायत एवं आसपास के ग्रामीण क्षेत्र (भागलपुर)।
बदलाव की बयार: आश्विन कृष्ण अष्टमी को रखे जाने वाले जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत की कामना का बेटियों तक विस्तार।
प्रेरक उदाहरण 1: रीमा कापरी (वार्ड संख्या 8, श्रीरामपुर)—दो बेटियों की लंबी उम्र और उज्ज्वल भविष्य के लिए निर्जला उपवास।
प्रेरक उदाहरण 2: मीणा देवी (रसीदपुर)—पांच बेटियों की मां; समानता और नारी सशक्तीकरण का संदेश देते हुए व्रत का संकल्प।
पारिवारिक सहयोग: मां के कठिन निर्जला व्रत की तैयारियों और जीमूतवाहन पूजा में बेटियां खुद आगे आकर बंटा रहीं हाथ।
बेटियों को मिले बराबरी का हक और सम्मान: मीणा देवी
वहीं, रसीदपुर निवासी मीणा देवी की पांच बेटियां हैं। वे भी अपनी लाडलियों की सलामती और सुरक्षा के लिए भगवान जीमूतवाहन की आराधना करती हैं। मीणा देवी का मानना है कि समय के साथ समाज को अपनी संकीर्ण मानसिकता से बाहर निकलना होगा। आज बेटियां उच्च शिक्षा, सरकारी-निजी नौकरियों, खेल और समाज के हर मोर्चे पर बेटों के बराबर या उनसे आगे बढ़कर जिम्मेदारियां संभाल रही हैं।
मीणा देवी कहती हैं कि जब बेटियां घर-परिवार को संभालने से लेकर माता-पिता की सेवा तक में बेटों से पीछे नहीं हैं, तो उनके साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव न्यायसंगत नहीं है। बेटियों को भी बेटों की तरह पूरा स्नेह, उचित सम्मान और आगे बढ़ने के समान अवसर मिलने चाहिए। अकबरनगर की इन माताओं की यह अनूठी पहल पूरे समाज के लिए नारी सशक्तीकरण और समानता की एक जीवंत मिसाल बन गई है।
