भागलपुर, आलोक कुमार मिश्रा। सोमवार की रात करीब 11.30 बजे होंगे। जागरण की टीम JLNMCH के इमरजेंसी वार्ड में दाखिल हुई। इमरजेंसी से वार्ड में जाने वाले बरामदे में अचानक शोर मचने लगा कि एक बच्चा चोरी हो गया है। अधेड़ महिला रोते-बिलखते मेडिकल कालेज अस्पताल के बरामदे में इधर-उधर बच्चे को खोज रही है। महिला की आवाज सुनकर प्रसूता वार्ड में मरीज की देखभाल कर रहे तीमारदार उसके पास पहुंच गये। वे कुछ समझ पाते तभी गुम हुआ बच्चा वापस आ गया। शुक्र है, बच्चा मिल गया।

इधर, टीम के सदस्यों के दिमाग में अस्पताल में हुई पूर्व की घटनाएं को लेकर इस बात की आशंका थी कि अस्पताल में रात्रि ड्यूटी में तैनात चिकित्सक और नर्स वार्ड में नहीं मिलेंगे। क्योंकि दो दिन पहले ही केंद्रीय मंत्री के छोटे भाई की जान चली गई थी। चिकित्सक मौके पर नहीं रहने का आरोप लगा हंगामा भी हुआ था। दो चिकित्सकों पर कार्रवाई भी हुई थी।

जब इतने कद्दावर लोगों के साथ इस तरह का व्यवहार है तो दूर दराज से एक उम्मीद की किरण लिए यहां पहुंचने वालों को कितनी मदद मिलती होगी। सो, इसकी पड़ताल जरूरी थी। इसके साथ ही दिमाग में यह भी सवाल उठ रहा था कि दो दिन पहले हुई घटना के बाद शायद व्यवस्था में सुधार हुआ होगा। पर सबकुछ पहले ही जैसा था। कुछ तस्वीरों को कैमरे में कैद भी किया गया। हर वार्ड की पड़ताल के बाद चला कि अस्पताल में लोगों की उम्मीदें टूटती क्यों है और हंगामा क्यों होता है।

रात 11: 40 : ट्रामा वार्ड में मरीज फर्श पर, दरवाजा बंद कर सो रही थी नर्स

ट्रामा वार्ड टीम पहुंची देखा कि मरीज फर्श पर सो रहे हैं। वार्ड के बाहर बने नर्स रूम का दरवाजा बंद था। खटखटाने पर कोई आवाज नहीं आई। कोई वार्ड का कर्मी भी नजर दिखाई नहीं पड़ा। चिकित्सक तो बहुत दूर की बात है। वार्ड में मौजूद मरीज के तीमारदार से पूछा कि रात्रि में यहां चिकित्सक आते हैं। तीमारदार ने कहा- रात में कोई डाक्टर नहीं आते हैं। दिक्कत होने पर किसी तरह से नर्स को जगाते हैं।

बता दें कि यह ट्रामा सेंटर जिस भवन में चल रहा है, उसे बाथ निवासी पांडेय परिवार ने अपने खर्च से निर्माण कराकर अस्पताल प्रशासन को सौंप दिया था।

रात 11:45 : ट्रालीमैन नहीं मिला तो मरीज को खुद ले गए परिजन

अचानक एक गाड़ी पर मरीज को दूसरे जिले से कुछ लोग अस्पताल में लेकर आए। कुछ देर तक वह इधर-उधर देखते रहे फिर बाहर खड़ी ट्राली को उठाया और मरीज को गाड़ी से उतारकर लेकर इमरजेंसी की तरफ गये। इमरजेंसी के गेट पर गार्ड जरूर मौजूद थे, लेकिन रोज की यही व्यवस्था को देखकर उन्हें कोई फर्क पड़ता नहीं दिखा। पता चला कि रात में किसी भी दिन ट्रालीमैन नहीं मिलते हैं। सिर्फ दावा होता है कि पूरी व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त है।

रात 11: 55 : हे मैडम, हे नर्स जी, दरवाजा खोलो

मेडिसिन वार्ड में भर्ती बेड नंबर 71 पर भर्ती मरीज अरविंद दास दर्द से कराह रहा था। उसे स्लाइन चढ़ाई जा रही थी, लेकिन स्लाइन बंद हो गई थी। मरीज का बेटा नीरज परेशान होकर इधर-उधर नर्स को खोज रहा था। पता चला कि नर्स कमरे में सो रही थी। नीरज दरवाजे के बाहर खड़ा चिल्ला रहा था कि मैडम दरवाजा खोलिए। स्लाइन बंद है। अंदर से आवाज आई- कुछ नहीं होगा। जाकर खुद निकाल दो। कुछ देर तक यह सिलसिला चलता रहा। नर्स दरवाजा खोलकर बाहर नहीं आई। फिर वार्ड में भर्ती अन्य मरीज के तीमारदार ने अरविंद के हाथ में लगी स्लाइन को निकाला।

रात 12:10 : गार्ड ने कहा- जरूरत पड़ने पर आते हैं डाक्टर

आईसीयू का मुख्य गेट बंद था। डाक्टर और नसों की कुर्सी खाली थी। अंदर अंधेरा था। सुरक्षा गार्ड अंदर जाने से रोक रहे थे। उनका कहना था कि डक्टर बगल वाले कमरे में है। जरूरत पड़ने पर बुलाने पर डाक्टर मरीज को देखने जाते हैं। फिर गार्ड बोला- साहब नौकरी लेंगे क्या। हम तो रखवाली करने वाले हैं। डाक्टर साहब के बारे में क्या कहेंगे।

रात 12:30 : इमरजेंसी के सामने प्रधानमंत्री जन सेवा केंद्र

इमरजेंसी के प्रधानमंत्री जन सेवा केंद्र खुला था। केंद्र के निकट ही एंबुलेंस 102 थी। वाहन पर मुफ्त सरकारी सेवा लिखा था। रिपोर्टर को देख चालन ने कहा- वाहन तो सरकारी है, लेकिन पेट सरकारी नहीं है। जो लोग मरीज को लेकर जाते हैं, वो चाय-पानी के लिए कुछ मदद कर देते हैं। आप लोगों की मदद से ही तो गुजारा होता है।

कैंटीन की सुविधा नहीं

अस्पताल में कैंटीन की सुविधा के लिए बढ़िया दुकान खोली गई थी। कुछ दिन चलने के बाद दुकान बंद हो गई। इसके बाद कोई सुविधा नहीं शुरू हुई। इमरजेंसी के समीप की कैटीन भी बंद हो चुका है। अब लोगों को अस्पताल के बाहर बनी दुकानों के सहारे ही काम चलाना पड़ रहा है।

Edited By: Aditi Choudhary