अमित कुमार राय, चंद्रमंडी (जमुई): कभी अंग्रेजों के जमाने में लगती थी दीवानी अदालत, अब पसरा है सन्नाटा। जी हां, कुछ यही स्थिति इन दिनों चकाई प्रखंड के खास चकाई कानूनगो बंगला की है, जहां अंग्रेजों के जमाने में दीवानी अदालत लगती थी। उस वक्त अंग्रेजों के राजतंत्र में कानूनगो बंगला के दीवान विशुन प्रसाद द्वारा दीवानी अदालत लगाया जाता था जिसमें आसपास के इलाकों के लोगों की समस्याओं का दीवान अदालत के माध्यम से निपटारा किया जाता था। कहा जाता है कि इस अदालत से जो निर्णय लिया जाता था लोग उसको सर्वमान्य तरीके से मानते थे। इसी कारण इलाके का नाम कानूनगो बंगला पड़ गया।

हालांकि, वर्तमान समय में दीवान जी के लिए बनाया गया ऐतिहासिक दीवान अदालत का भवन अब जर्जर होकर खंडहर में तब्दील हो गया है। कभी लोगों का जमावड़ा रहता था। अब ऐतिहासिक भवन भूतबंगला में तब्दील होकर रह गया है। खास चकाई के बुजुर्ग 80 वर्षीय लक्ष्मी कांत पांडे कहते हैं कि ब्रिटिश राज्य की बोसी स्टेट की रानी द्वारा विष्णु प्रसाद को आजादी से पूर्व दीवान की पदवी दी गई थी जिसके बाद वे इलाके में दीवान के नाम से मशहूर हुए। तब के जमाने में दीवान जी ने कानून और वकालत की पढ़ाई की थी। तब उनके द्वारा खास चकाई स्थित उस जगह पर बैठकर लोगों की समस्याओं एवं कानूनों की जानकारी दी जाती थी। कहा जाता है कि तब दूर-दराज के इलाके के लोग कानून और अपनी समस्याओं के न्याय के लिए दीवान जी के पास आते थे। इसलिए उस जगह का नाम कानूनगो बंगला पड़ गया।

(बंगला एरिया में बना प्राचीन शिव मंदिर)

बंगला में 40 से अधिक कमरों का विशालकाय मकान और बांग्ला था, जिसमें मंदिर से लेकर बगीचा और कुआं से लेकर वाहनों का गैरेज तक था। अभी भी दीवान जी द्वारा बनाया गया ऐतिहासिक शिव पार्वती मंदिर, चंद्रकूप, बगीचा और तालाब स्थित है, जो उद्धारक की बाट जोह रहा है जिसमें सभी कार्यों के लिए अलग-अलग नौकर चाकर थे। तब दीवान जी की चलती की चर्चा पूरे इलाके में थी। लक्ष्मी कांत पांडे कहते हैं कि तब दीवान जी द्वारा जो भी जानकारी या फैसला सुनाया जाता था। इलाके के लोगों के लिए कानून बन जाता था और लोग उसका सर्वसम्मति से पालन करते थे।

खंडहर में तब्दील हो रहा दीवान का बंगला

बाद के वर्षों में दीवान जी की मौत के बाद स्थिति में बदलाव हुआ। धीरे-धीरे उनका बंगला जीर्ण-शीर्ण होता रहा। उचित देखरेख के अभाव में वर्तमान समय में उनका दीवानी अदालत और बांग्ला जर्जर होकर गिर रहा है। हालांकि, आज भी वह बंगला विशालकाय खंडहरनुमा भवन के रूप में मौजूद है। दीवान जी के परिवार के सदस्य बाल गोङ्क्षवद प्रसाद, गोपाल प्रसाद, बाबी सिन्हा, त्रिपुरारी प्रसाद बताते हैं कि दीवान जी की मौत के बाद बंगले की देखरेख नहीं हो पाई। बड़े एरिया में फैले रहने के कारण वह लोग बंगले का देखरेख और मेंटनेंस करने में असमर्थ हैं।

Edited By: Shivam Bajpai