भागलपुर [दिनकर]। प्रकृति से छेड़छाड़ का क्या कुप्रभाव पड़ता है, यह हाल के वर्षो की लगातार त्रासदी से समझा जा सकता है। जलवायु परिवर्तन एक नई समस्या लेकर आया है। सितंबर माह तक भागलपुर प्रमंडल के दक्षिणी हिस्से में सुखाड़ की स्थिति थी तो उत्तरी हिस्सा बाढ़ से त्रस्त था। प्रमंडल में आधा दर्जन डैम हैं, सभी के सभी खाली थे। अक्टूबर माह में दो सप्ताह की बारिश से कई डैम फुल हो गये और खेतों को पानी भी मिला लेकिन ‘का वर्षा जब कृषि सुखाने’ जैसी स्थिति ही रही।

बाढ़ से हो रही तबाही

भागलपुर जिले का उत्तरी हिस्सा बाढ़ से तबाह हो गया है। खेतों में पानी घुसने से फसल बर्बाद हो गई है। पशुओं को चारा नहीं मिल रहा है। ऐसा भी नहीं कि यहां बाढ़ पहली बार आई है। दरअसल गंगा नदी में गाद भर जाने से हाल के कुछ वर्षो में इसकी भयावहता बढ़ती जा रही है। वैसे इलाकों में भी बाढ़ का पानी फैल गया, जो कभी सुरक्षित क्षेत्र माना जाता था। सवाल यह कि ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई है?

भूगर्भशास्त्री डॉ. रंजीत सिंह कहते हैं कि यह प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा है। वनों की अंधाधुंध कटाई और पत्थरों के उत्खनन से राजमहल की पहाड़ी नंगी हो गई है। मिट्टी वर्षा के वेग को सह नहीं पा रही है और वह बरसाती पहाड़ी नदियों के सहारे गंगा के गर्भ में पहुंच रही है। बांका, गोड्डा, दुमका और साहिबगंज की उपजाऊ मिट्टी वर्षा के साथ लगातार खुरच रही है। इससे वहां खेतों के बंजर होने का खतरा लगातार बढ़ रहा है।

Posted By: Dilip Shukla

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