अंगिका को समृद्ध बनाएगी बाल पत्रिका 'धिया-पूता'! भागलपुर विवि के प्रोफेसर का अनूठा अभियान, बच्चों के लिए होगी नि:शुल्क
Dhiya Puta Angika Magazine: भागलपुर के तिलकामांझी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. मनजीत सिंह किनवार 'धिया-पूता' नामक मासिक बाल पत्रिका प्रकाशित ...और पढ़ें

Dhiya Puta Angika Magazine: तिलकामांझी भागलपुर विवि के प्रोफेसर डॉ. मनजीत सिंह की अनूठी पहल
HighLights
डॉ. मनजीत किनवार 'धिया-पूता' मासिक बाल पत्रिका कर रहे प्रकाशित।
पत्रिका बच्चों को अंगिका भाषा-संस्कृति से जोड़ेगी, नि:शुल्क मिलेगी।
ज्ञान-विज्ञान, मनोरंजन संग बच्चों की रचनात्मकता को मिलेगा मंच।
जागरण संवाददाता, भागलपुर। Dhiya Puta Angika Magazine: अपनी माटी, भाषा और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से नई पीढ़ी का जुड़ाव अटूट बना रहे, इसके लिए भागलपुर में एक अनूठी और अनुकरणीय मुहिम शुरू की गई है। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) के हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक डा. मनजीत सिंह किनवार अंगिका भाषा और संस्कृति के प्रचार-प्रसार को लेकर बच्चों को केंद्र में रखकर एक बड़ा अभियान चला रहे हैं। वे अपने निजी खर्च से 'धिया-पूता' (Dhiya-Puta) नामक मासिक बाल पत्रिका प्रकाशित करने की तैयारी में जुटे हैं।
इस पत्रिका के माध्यम से अंग प्रदेश के बच्चों को अपनी मातृभाषा में पढ़ने, लिखने और अपनी छिपी हुई प्रतिभाओं को उजागर करने का एक रचनात्मक मंच मिलेगा। डा. मनजीत का स्पष्ट मानना है कि जिस भाषा में बच्चे स्वाभाविक रूप से सोचते हैं और अपने भाव व्यक्त करते हैं, उसी भाषा के साहित्य से उनका जुड़ाव भी मजबूत होना चाहिए।
ज्ञान-विज्ञान से लेकर मनोरंजन तक, बच्चों को नि:शुल्क मिलेगी प्रतियां
मासिक बाल पत्रिका 'धिया-पूता' को बच्चों के बौद्धिक और मानसिक विकास के अनुकूल तैयार किया जा रहा है। इसमें ज्ञान-विज्ञान, सामान्य ज्ञान, नैतिक शिक्षा और शुद्ध मनोरंजन से जुड़ी प्रचुर पाठ्य सामग्री प्रकाशित की जाएगी। इसके साथ ही, बच्चों द्वारा लिखी गई कविताओं, कहानियों और उनकी अन्य रचनात्मक गतिविधियों को भी इस पत्रिका में विशेष स्थान दिया जाएगा।
डा. किनवार का लक्ष्य है कि अंग प्रदेश के ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों के बच्चों तक इस पत्रिका की प्रतियां बिल्कुल नि:शुल्क (Free of Cost) पहुंचाई जाएं, ताकि कोई भी बच्चा अपनी लोकभाषा के साहित्य से वंचित न रहे। इसके अतिरिक्त, अंग प्रदेश से बाहर देश-दुनिया के अन्य हिस्सों में रह रहे अंगिका प्रेमियों तक इस पत्रिका को डाक (Postal Services) के माध्यम से भेजने की भी विशेष योजना तैयार की गई है।
फिल्मों और अभिनय के जरिए अंगिका को लोकप्रिय बनाने का प्रयास
डा. मनजीत सिंह किनवार की भाषा के प्रति प्रतिबद्धता केवल पारंपरिक साहित्यिक गतिविधियों या कागजों तक ही सीमित नहीं है। वे आधुनिक संचार माध्यमों का उपयोग कर अंगिका को हर वर्ग तक पहुंचा रहे हैं। उन्होंने 'छुटकारा', 'बुड़बक' और 'आनलाइन' जैसी चर्चित अंगिका लघु फिल्मों (Short Films) का निर्माण किया है, जिनमें उन्होंने स्वयं अभिनय भी किया है और कलात्मक निर्देशन भी संभाला है।
इन फिल्मों और नाटकों के माध्यम से वे न केवल अपनी मातृभाषा को जन-जन तक पहुंचा रहे हैं, बल्कि सामाजिक कुप्रथाओं और समसामयिक विषयों पर समाज को जागरूक भी कर रहे हैं। उनका मानना है कि मोबाइल और फिल्मों के इस डिजिटल युग में अपनी भाषा को नए माध्यमों के जरिए ही जिंदा और लोकप्रिय रखा जा सकता है।
कविता और शोध में भी दिखता है गहरा अंगिका प्रेम
अंगिका के सशक्त युवा कवि के रूप में अपनी पहचान रखने वाले डा. किनवार की यह भाषा-प्रीति उनके अकादमिक और शोध कार्यों में भी साफ झलकती है। उन्होंने अपने उच्चस्तरीय शोध कार्य (Research) में भी अंगिका को मुख्य विषय के रूप में शामिल किया था।
वे भारतेन्दु हरिश्चंद्र की ऐतिहासिक पंक्तियों— "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल" को अपने जीवन और इस पूरे अभियान की मूल प्रेरणा मानते हैं। उनका कहना है कि मातृभाषा केवल आपस में बातचीत या संवाद का साधन नहीं है, बल्कि यह किसी भी समाज की सामूहिक सांस्कृतिक पहचान और उसकी सदियों पुरानी परंपराओं की वाहक होती है। डा. किनवार की यह कोशिश अंगिका को घर-परिवार की अनौपचारिक बातचीत के दायरे से बाहर निकालकर साहित्य के उच्च स्तर तक स्थापित करने की है, ताकि नई पीढ़ी अपनी भाषाई जड़ों पर गर्व कर सके।
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