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बिहार में मोबाइल से मिल रहा रोजगार, गिग इकोनॉमी से रुक सकता है पलायन

Published: Sun, 20 Sep 2026 01:18 PM (IST)

बिहार में मोबाइल आधारित गिग अर्थव्यवस्था रोजगार के तरीके को बदल रही है, जिससे युवाओं को स्थानीय स्तर पर कमाई के अवसर मिल रहे हैं।

एआई जनरेडेट फोटो

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HighLights

  1. मोबाइल आधारित गिग काम बिहार में रोजगार के अवसर बढ़ा रहा है।

  2. भागलपुर में 18 हजार युवा गिग काम से जुड़कर कमाई कर रहे।

  3. गिग अर्थव्यवस्था पलायन रोकने, स्थानीय विकास में सहायक बन रही है।

जागरण संवाददाता, भागलपुर। बिहार में रोजगार का चेहरा बदल रहा है। कभी रोजगार के लिए दिल्ली, मुंबई, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और कर्नाटक जाने वाले युवाओं के हाथ में अब मोबाइल रोजगार का साधन बन रहा है। भोजन और सामान पहुंचाने, वाहन सेवा, कुरियर, ऑनलाइन पढ़ाई, प्रचार-प्रसार, लेखन, चित्रांकन और अन्य स्वतंत्र कामों के जरिए युवा स्थानीय स्तर पर कमाई कर रहे हैं।

भागलपुर में करीब 18 हजार युवा गिग काम से जुड़े बताए जा रहे हैं। इसी बदलते रोजगार परिदृश्य को केंद्र में रखकर तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभागाध्यक्ष डा. अभिषेक आनंद ने बढ़ते बिहार में काम आधारित अर्थव्यवस्था पुस्तक लिखी है।

इस पुस्तक में महिला आधारित छोटे कारोबार और स्वयं सहायता समूहों को भी गिग अर्थव्यवस्था से जोड़ने की संभावना बताई गई है। खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, सिलाई-कढ़ाई, हस्तशिल्प, सौंदर्य सेवाएं और घरेलू उत्पादों को इंटरनेट आधारित बाजार से जोड़कर महिलाएं घर से कारोबार कर सकती हैं।

कृषि में उपकरण किराये पर उपलब्ध कराने, ड्रोन सेवा, कृषि सलाह, पैकिंग, परिवहन और उपज की आपूर्ति जैसे क्षेत्रों में भी रोजगार की संभावना है।

स्थायी नौकरी के बजाय काम के आधार पर कमाई

गिग अर्थव्यवस्था में व्यक्ति किसी एक संस्थान में स्थायी नौकरी करने के बजाय अलग-अलग काम, सेवा या परियोजना के आधार पर आय अर्जित करता है। मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल मंचों ने इस व्यवस्था को गति दी है।

इसकी खासियत यह है कि कामगार अपनी सुविधा के अनुसार काम के घंटे चुन सकते हैं। स्थानीय स्तर पर काम के घंटे और उपलब्ध काम के अनुसार कई कामगारों की मासिक आय 15 से 20 हजार रुपये तक पहुंच रही है।

एक गिग कामगार रोहित कुमार के अनुसार इस काम का सबसे बड़ा फायदा समय की स्वतंत्रता है। पढ़ाई या दूसरे काम के साथ भी कुछ घंटे काम कर कमाई की जा सकती है।

वहीं, सुमित का कहना है कि नौकरी की तलाश में खाली बैठने के बजाय मोबाइल के जरिये तुरंत काम शुरू किया जा सकता है। हालांकि पेट्रोल, वाहन रखरखाव और मौसम जैसी चुनौतियां भी हैं।

पलायन की चुनौती के बीच स्थानीय विकल्प

बिहार में सीमित औद्योगीकरण और गैर-कृषि रोजगार के अवसरों की कमी लंबे समय से पलायन की वजह रही है। पुस्तक में गिग अर्थव्यवस्था को स्थानीय रोजगार के संभावित विकल्प के रूप में देखा गया है।

यदि युवाओं को अपने जिले या आसपास के शहर में डिलीवरी, परिवहन, आपूर्ति, ऑनलाइन शिक्षा और अन्य सेवाओं में काम मिले तो महानगरों की ओर पलायन की मजबूरी कम हो सकती है।

भागलपुर के रेशम को डिजिटल बाजार का सहारा

भागलपुर की रेशम और हथकरघा परंपरा को भी इस नई अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा सकता है। अभिषेक ने बताया कि बुनकरों के उत्पादों को देश-दुनिया के बाजार तक पहुंचाने में आनलाइन बिक्री, प्रचार-प्रसार, पैकेजिंग, आर्डर प्रबंधन और सामान पहुंचाने की भूमिका बढ़ सकती है।

इससे पारंपरिक उद्योग के साथ युवाओं के लिए नए रोजगार पैदा होंगे। सरकार की इस ओर ध्यान देने से बुनकरों का लाभ कई गुणा बढ़ सकती है।

डॉ. अभिषेक आनंद ने बताया कि पुस्तक का मूल विमर्श यही है कि बिहार को केवल गिग कामगार नहीं, बल्कि ऐसा गिग पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करना होगा, जिसमें स्थानीय रोजगार, कौशल, उद्यमिता और सामाजिक सुरक्षा साथ-साथ आगे बढ़ सके।

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