जलवायु परिवर्तन के बीच बिहार की खेती में नई उम्मीद, सबौर कृषि विश्वविद्यालय में रबी अनुसंधान, 'चना-4' पर मंथन
बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में रबी मौसम 2026-27 की 32वीं अनुसंधान परिषद की बैठक हुई, जहाँ जलवायु-स्मार्ट कृषि और आधुनिक ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर
HighLights
जलवायु-स्मार्ट कृषि और आधुनिक तकनीकों पर विशेष जोर।
'सबौर चना-4' के व्यावसायिक उपयोग पर विस्तार से विचार।
25 से अधिक कृषि उत्पादों के जीआई टैग प्रक्रिया में।
संवाददाता, भागलपुर। मौसम के बदलते मिजाज, खेती की बढ़ती लागत और फसलों पर लगातार बढ़ रहे रोगों के खतरे के बीच बिहार की कृषि व्यवस्था को टिकाऊ और आधुनिक बनाने के लिए बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर में बड़ा मंथन शुरू हुआ है।
वैज्ञानिक शोध और आधुनिक तकनीकों को सीधे किसानों के खेतों तक पहुंचाने के उद्देश्य से गुरुवार को विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. डीआर सिंह की अध्यक्षता में रबी मौसम 2026-27 की 32वीं अनुसंधान परिषद की दो दिवसीय बैठक का भव्य शुभारंभ हुआ।
इस बैठक में मुख्य रूप से जलवायु-स्मार्ट कृषि, फसल विविधीकरण, मृदा स्वास्थ्य सुधार, किसानों की पारंपरिक बीज किस्मों के संरक्षण, कार्बन फार्मिंग और खेती में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) के प्रयोग पर विशेष जोर दिया गया।
प्रयोगशाला से खेतों तक पहुंचे शोध का लाभ: कुलपति
समारोह को संबोधित करते हुए कुलपति डॉ. डीआर सिंह ने वैज्ञानिकों को स्पष्ट निर्देश दिए कि शोध योजनाएं बनाते समय स्थानीय कृषि परिस्थितियों और किसानों की वास्तविक जमीनी समस्याओं को केंद्र में रखा जाए।
उन्होंने कहा कि बदलती जलवायु के अनुरूप सहिष्णु फसल किस्मों, संसाधन संरक्षण और आधुनिक तकनीकों को प्राथमिकता देनी होगी। कुलपति ने जोर देकर कहा कि अनुसंधान को शिक्षा, प्रशिक्षण, नवाचार और उद्यमिता से जोड़ना होगा, ताकि इसका सीधा फायदा विद्यार्थियों, किसानों और कृषि आधारित नए उद्यमियों तक तेजी से पहुंचे।
'अन्वेषण' कार्यक्रम को मिली मंजूरी और छात्रों को प्रोत्साहन
बैठक के दौरान कृषि शिक्षा और छात्रों के हित में बड़े फैसलों की जानकारी दी गई। कुलपति ने बताया कि राज्य के कृषि मंत्री ने विद्यार्थियों के व्यावहारिक प्रशिक्षण से जुड़े ‘अन्वेषण’ कार्यक्रम की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी है।
इसके अलावा, वानिकी (Forestry) महाविद्यालय के विद्यार्थियों को डिग्री पूर्ण करने के बाद वन विभाग में एक वर्ष तक आकस्मिक सहायता उपलब्ध कराने की ऐतिहासिक पहल की भी जानकारी दी गई।
25 से अधिक उत्पादों के जीआई टैग पर काम, 'सबौर चना-4' पर विचार
विश्वविद्यालय के निदेशक अनुसंधान डॉ. अनिल कुमार सिंह ने प्रगति प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए बताया कि वर्तमान में बीएयू में लगभग 600 अनुसंधान परियोजनाएं सफलतापूर्वक संचालित हो रही हैं। उन्होंने बताया कि बिहार की समृद्ध पहचान से जुड़े 25 से अधिक स्थानीय कृषि उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) दिलाने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है।
बैठक के दौरान गेहूं, मक्का, दलहन, तिलहन, आणविक जीव विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी तथा फल-सब्जी विज्ञान से जुड़े प्रमुख शोधों की गहन समीक्षा की गई। इस क्रम में दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए चना की नई प्रस्तावित किस्म ‘सबौर चना-4’ के व्यावसायिक प्रयोग और प्रसार पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ।
उद्घाटन सत्र के दौरान कृषि अनुसंधान, मृदा स्वास्थ्य, कृषि व्यवसाय, फसल अवशेषों (पराली) से जैविक खाद बनाने और पारंपरिक बीजों के संरक्षण से जुड़े कई महत्वपूर्ण तकनीकी प्रकाशनों का विमोचन भी किया गया।
यह भी पढ़ें- दिल्ली में राष्ट्रीय टेनिस बॉल क्रिकेट खेलेंगी भागलपुर की बेटियां, जीसिका और तनीषा का अंडर-19 बिहार टीम में चयन
