ACS की फटकार और RDDE के आदेश को दबाकर बैठे रहे अफसर; अगर मार्च में हटते अविनाश और शिशिर तो न होता ₹98 लाख का गबन
Bhagalpur Education Scam : भागलपुर शिक्षा विभाग में 98 लाख रुपये के सरकारी गबन का मामला विभागीय अधिकारियों की घोर ...और पढ़ें

Bhagalpur Education Scam : अविनाश राज और शिशिर कुमार झा
HighLights
भागलपुर शिक्षा विभाग में 98 लाख का सरकारी गबन।
ACS और RDDE के आदेशों की हुई अनदेखी।
लिपिक शिशिर झा व ऑपरेटर अविनाश राज पर आरोप।
अभिषेक प्रकाश, भागलपुर। Bhagalpur Education Scam : जिला शिक्षा विभाग में फर्जी शिक्षक आईडी बनाकर 98 लाख 12 हजार 773 रुपये के सरकारी गबन का मामला महज एक शातिर ऑपरेटर की चालाकी भर नहीं है। इस प्रकरण ने विभागीय उच्चाधिकारियों की घोर लापरवाही, संदेहास्पद चुप्पी और आदेशों की खुली अवहेलना की भी परतें उधेड़ दी हैं।
यदि विभाग ने अपने ही सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारियों के आदेशों का 10 प्रतिशत भी पालन किया होता, तो शायद सरकारी खजाने में लगी यह 98 लाख की सेंधमारी कभी न होती। सवाल यह गूंज रहा है कि जब शीर्ष स्तर से दोनों कर्मियों पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं, तब जिला स्तर पर फाइलों को क्यों दबाए रखा गया?
वर्तमान में इस बहुचर्चित गबन कांड में फरार चल रहे उच्च वर्गीय लिपिक शिशिर कुमार झा और पुलिस हिरासत व न्यायिक प्रक्रिया से घिरे ऑपरेटर अविनाश राज की भूमिका लगातार सवालों के घेरे में है। अविनाश ने शिशिर झा की यूजर आईडी का उपयोग कर फर्जी शिक्षिका का खाता जोड़ा और लाखों रुपये फरीदाबाद के खाते में ट्रांसफर कर दिए।
17 मार्च को ACS ने लगाई थी फटकार
पूरे मामले की जड़ें मार्च महीने से जुड़ी हैं। 17 मार्च को शिक्षा विभाग के तत्कालीन अपर मुख्य सचिव (ACS) ने भागलपुर जिले का सघन निरीक्षण किया था। इस दौरान शिक्षकों के वेतन भुगतान में जानबूझकर की जा रही देरी और मनमानी की शिकायतें सामने आने पर ACS ने भारी नाराजगी जताई थी। उन्होंने मौके पर ही लिपिक शिशिर झा और संविदा ऑपरेटर अविनाश राज को कड़ी फटकार लगाते हुए दोनों का पटल (संभाग) तत्काल प्रभाव से बदलने का स्पष्ट निर्देश दिया था।
18 को निकला था पत्र
अपर मुख्य सचिव के कड़े तेवर को देखते हुए अगले ही दिन यानी 18 मार्च को तत्कालीन क्षेत्रीय शिक्षा उपनिदेशक (RDDE) ने पत्रांक जारी कर तत्कालीन डीईओ को निर्देश दिया। पत्र में शिशिर झा से स्पष्टीकरण मांगते हुए उनका वेतन स्थगित करने और ऑपरेटर अविनाश राज को स्थापना शाखा के वेतन पटल से हटाकर दूसरा संभाग देने का आदेश दिया गया था।
कागजों में सिमटी कार्रवाई
हैरानी की बात यह है कि मुख्यालय के इतने सख्त निर्देश के बाद भी जिला स्तर पर लीपापोती का खेल शुरू हो गया। शिशिर झा पर कार्रवाई केवल वेतन रोकने तक सीमित कर दी गई, जबकि ऑपरेटर अविनाश का संभाग तक नहीं बदला गया।
जून तक खेल करता रहा ऑपरेटर
अविनाश राज 18 मार्च के बाद भी बदस्तूर उसी कुर्सी और कंप्यूटर पर बैठकर वेतन का काम देखता रहा। वह 9 जून को सेवामुक्त होने तक स्थापना शाखा में अपनी पकड़ बनाए रहा। इसी ढिलाई का फायदा उठाकर उसने लॉगिन आईडी और पासवर्ड का खेल रचा और ₹98.12 लाख का वारा-न्यारा कर दिया।
4 साल से एक ही पटल पर जमे थे लिपिक
सरकारी नियमावली के अनुसार, किसी भी कर्मचारी का एक पटल पर अधिकतम कार्यकाल तीन वर्ष का होता है, जिसके बाद उसका संभाग या कार्यालय बदला जाता है। इसके विपरीत, लिपिक शिशिर झा पिछले चार वर्षों से लगातार स्थापना शाखा के सबसे संवेदनशील 'वेतन भुगतान' पटल पर कुंडली मारकर बैठे रहे।
संघ ने भी लगाए थे आरोप
इस दौरान उनके खिलाफ शिक्षकों के संघों द्वारा प्रतिनियुक्ति और तबादलों के नाम पर अवैध वसूली के गंभीर आरोप भी लगाए गए थे। इसके बावजूद तत्कालीन और वर्तमान विभागीय अधिकारी आंखें मूंदकर बैठे रहे। अब गबन का पर्दाफाश होने के बाद शिक्षा विभाग में हड़कंप मचा है और सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या सिर्फ लिपिक और ऑपरेटर ही दोषी हैं, या आदेशों को दबाकर बैठने वाले तत्कालीन अधिकारी भी इस महाघोटाले के बराबर के भागीदार हैं?
