फिटनेस भी, बचत भी... भागलपुर में फिर लौट रहा साइकिल का दौर, कभी थी मजबूरी, अब बन गई स्टेटमेंट
भागलपुर में साइकिल का चलन तेजी से बढ़ रहा है, जो अब मजबूरी नहीं बल्कि स्वस्थ जीवनशैली, पर्यावरण संरक्षण और ...और पढ़ें

पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों के बीच साइकिल की ओर लौट रहे लोग, भागलपुर में बिक्री 10% तक बढ़ी
HighLights
साइकिल बिक्री में 10% की वृद्धि दर्ज।
बैटरी चालित साइकिलों की मांग तेजी से बढ़ी।
स्वस्थ जीवनशैली और ईंधन बचत का माध्यम।
जागरण संवाददाता, भागलपुर। कभी साइकिल को केवल जरूरत या मजबूरी का साधन माना जाता था। खासकर युवाओं के बीच साइकिल चलाने को लेकर झिझक देखने को मिलती थी। समय के साथ यह सोच तेजी से बदली है। आज साइकिल केवल एक वाहन नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली, पर्यावरण संरक्षण और सादगी की पहचान बनती जा रही है। पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों ने भी लोगों को वैकल्पिक साधनों की ओर आकर्षित किया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा समय-समय पर ईंधन बचत और पर्यावरण संरक्षण को लेकर दिए गए संदेशों का भी असर लोगों की जीवनशैली पर दिखाई दे रहा है। इसका सीधा प्रभाव साइकिल बाजार पर देखने को मिल रहा है। शहर के साइकिल कारोबारियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में साइकिल की बिक्री में करीब 10 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है।
बैटरी साइकिलों की बढ़ी मांग
एमपी द्विवेदी रोड स्थित साइकिल कारोबारी चरणजीत सिंह बताते हैं कि पहले साइकिल की मांग मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों और विद्यार्थियों तक सीमित रहती थी। लेकिन अब नौकरीपेशा लोग, व्यवसायी और युवा वर्ग भी इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना रहे हैं।
उन्होंने बताया कि खासकर बैटरी चालित साइकिलों की मांग तेजी से बढ़ रही है। बाजार में इनकी कीमत 20 हजार रुपये से लेकर 65 हजार रुपये तक है। वहीं सामान्य साइकिलें चार हजार से छह हजार रुपये की कीमत में उपलब्ध हैं। लोगों का मानना है कि इससे ईंधन खर्च बचाने के साथ-साथ रोजमर्रा के छोटे सफर आसानी से पूरे किए जा सकते हैं।
व्यापारियों के अनुसार फिटनेस के प्रति बढ़ती जागरूकता और ट्रैफिक की समस्या भी साइकिल की लोकप्रियता बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
बच्चों में भी बढ़ रहा साइकिल का क्रेज
साइकिल विक्रेता नवीन कुमार बताते हैं कि बच्चों के बीच भी साइकिल को लेकर उत्साह लगातार बढ़ रहा है। पहले जहां बच्चे अधिक समय मोबाइल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर बिताते थे, वहीं अब अभिभावक उन्हें शारीरिक गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
इसी कारण बड़ी संख्या में माता-पिता अपने बच्चों के लिए साइकिल खरीद रहे हैं। इससे बच्चों की साइकिलों की बिक्री में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि साइकिल चलाने से बच्चों का शारीरिक विकास बेहतर होता है और वे स्क्रीन टाइम से भी दूर रहते हैं।
‘साइकिल वाली मैम’ के नाम से मिली पहचान
तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर राजनीति विज्ञान विभाग में कार्यरत डॉ. रूचि श्री पिछले कई वर्षों से नियमित रूप से साइकिल से कॉलेज जाती हैं। उनका मानना है कि साइकिल ने केवल उनकी दिनचर्या नहीं बदली, बल्कि समाज को समझने का एक नया नजरिया भी दिया है।
डॉ. रूचि श्री बताती हैं कि साइकिल से आने-जाने के दौरान उन्हें शहर और मोहल्लों की छोटी-बड़ी समस्याओं को करीब से देखने का अवसर मिलता है। एक क्षेत्र में पानी की समस्या को देखकर उन्होंने स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों से बातचीत की और समाधान की दिशा में पहल भी की।
उनके अनुसार मोटर वाहन से यात्रा करने पर आसपास की गतिविधियों पर उतना ध्यान नहीं जा पाता, जबकि साइकिल से चलने पर क्षेत्र की वास्तविक परिस्थितियों को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। यही वजह है कि वे आज भी साइकिल को अपनी दिनचर्या का अहम हिस्सा मानती हैं।
छात्रों की सोच भी बदली
डॉ. रूचि श्री बताती हैं कि शुरुआत में कई छात्र और छात्राएं साइकिल से कॉलेज आने में संकोच महसूस करते थे। उन्हें लगता था कि साइकिल केवल आर्थिक मजबूरी का प्रतीक है। लेकिन जब छात्रों ने अपने शिक्षक को नियमित रूप से साइकिल चलाते देखा तो उनका नजरिया बदलने लगा।
धीरे-धीरे कई छात्र भी साइकिल से कॉलेज आने लगे। आज स्थिति यह है कि विश्वविद्यालय परिसर में उनकी पहचान ‘साइकिल वाली मैम’ के रूप में बन चुकी है। उनका कहना है कि साइकिल ने उन्हें समाज के विभिन्न वर्गों से जोड़ने और बेहतर संबंध बनाने का अवसर दिया है।
कारोबारी ने अपनाई साइकिल, बच रही रकम
साहेबगंज निवासी ब्रजेश कुमार बंटी भी उन लोगों में शामिल हैं जिन्होंने अपनी जीवनशैली में साइकिल को शामिल किया है। वे प्रतिदिन खलीफाबाग चौक स्थित अपनी मोबाइल दुकान साइकिल से पहुंचते हैं।
ब्रजेश बताते हैं कि शुरुआत में उन्हें भी साइकिल चलाने में झिझक महसूस होती थी। हालांकि ईंधन बचत को लेकर चलाए जा रहे जागरूकता अभियानों और प्रधानमंत्री के संदेशों से प्रेरित होकर उन्होंने साइकिल का उपयोग शुरू किया। अब वे नियमित रूप से इसी माध्यम से दुकान आते-जाते हैं।
उनका कहना है कि इससे न केवल पेट्रोल पर होने वाला खर्च बचता है, बल्कि स्वास्थ्य भी बेहतर रहता है। नियमित साइकिल चलाने से शरीर सक्रिय रहता है और कई बीमारियों का खतरा भी कम होता है।
स्वस्थ जीवन और पर्यावरण संरक्षण का माध्यम
ब्रजेश कुमार के अनुसार आज मोटरसाइकिल चलाना आम बात हो गई है, लेकिन साइकिल चलाने के लिए अनुशासन और इच्छाशक्ति की जरूरत होती है। उनका मानना है कि साइकिल केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक होने की पहचान भी है।
पर्यावरण विशेषज्ञ भी मानते हैं कि साइकिल का अधिक उपयोग प्रदूषण कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इससे ईंधन की खपत घटती है और कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आती है।
इसी कारण अब साइकिल को मजबूरी नहीं, बल्कि एक सकारात्मक, जिम्मेदार और स्वस्थ जीवनशैली के प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा है। युवाओं, विद्यार्थियों, शिक्षकों और कारोबारियों के बीच बढ़ती इसकी लोकप्रियता इस बदलती सोच का स्पष्ट संकेत है।
