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अब 'जॉब सीकर' नहीं, 'जॉब प्रोवाइडर' बनेंगे कृषि छात्र; बीएयू सबौर की ASSIST परियोजना को ₹4.80 करोड़ की मंजूरी

Published: Thu, 29 Oct 2026 11:49 PM (IST)

बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर की 'एएसएसआइएसटी' परियोजना को सरकार से मंजूरी मिली है। यह परियोजना कृषि छात्रों को नौकरी ...और पढ़ें

BAU Sabour ASSIST Project:  नौकरी मांगने के बजाय रोजगार देंगे बीएयू सबौर के छात्र

BAU Sabour ASSIST Project:  नौकरी मांगने के बजाय रोजगार देंगे बीएयू सबौर के छात्र

HighLights

  1. एएसएसआइएसटी परियोजना कृषि छात्रों को उद्यमी बनाएगी।

  2. ₹4.80 करोड़ की वित्तीय मंजूरी मिली है।

  3. व्यावहारिक प्रशिक्षण से छात्रों के रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।

जागरण संवाददाता, भागलपुर। BAU Sabour ASSIST Project: कृषि स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद युवाओं को अब सरकारी या निजी नौकरी की तलाश में नहीं भटकना पड़ेगा, बल्कि वे खुद का सफल कृषि उद्यम स्थापित कर अन्य युवाओं को भी रोजगार मुहैया कराएंगे। विद्यार्थियों को 'जॉब सीकर' के बजाय 'जॉब प्रोवाइडर' बनाने के इस विजन के साथ बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर ने एक क्रांतिकारी पहल की है।

विश्वविद्यालय के सभी नौ अंगीभूत कॉलेजों में कृषि छात्रों को कॉर्पोरेट जगत, एग्री-स्टार्टअप्स और ग्रामीण उद्यमों से सीधे जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी परियोजना 'एएसएसआइएसटी' (Agriculture Students Securing Industrial and Start-up Training) को बिहार सरकार के कृषि विभाग ने विधिवत मंजूरी दे दी है।

इस परियोजना के सुचारू संचालन के लिए वित्तीय वर्ष 2026-27 से 2029-30 तक के चार वर्षों के लिए कुल 4.80 करोड़ रुपये की प्रशासनिक स्वीकृति दी गई है। वहीं, चालू वित्तीय वर्ष में ही जमीनी स्तर पर कार्य शुरू करने के लिए 90 लाख रुपये के सहायक अनुदान की पहली किस्त को भी मंजूरी मिल गई है।

पढ़ाई के साथ उद्योगों में सीखेंगे कारोबार के गुर

एएसएसआइएसटी परियोजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान से बाहर निकालकर सीधे औद्योगिक वातावरण में उतारेगी। छात्र-छात्राओं को प्रमुख कृषि आधारित उद्योगों, सफल स्टार्टअप्स और अनुभवी उद्यमियों के साथ मिलकर काम करने का ऑन-साइट अवसर मिलेगा।

इसके तहत बायोफर्टिलाइजर (जैव उर्वरक), बायोपेस्टीसाइड (जैव कीटनाशक), मशरूम उत्पादन, टिशू कल्चर, वर्मीकम्पोस्ट (केंचुआ खाद), वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन और खाद्य प्रसंस्करण जैसे उच्च मांग वाले क्षेत्रों में व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। इससे छात्रों को न केवल उत्पाद तैयार करने की तकनीकी बारीकियां समझ में आएंगी, बल्कि पैकेजिंग, ब्रांडिंग, लॉजिस्टिक्स और बाजार तक पहुंच (Market Linkage) बनाने का व्यावसायिक अनुभव भी हासिल होगा।

डेढ़ साल के मंथन के बाद मिली सरकार की हरी झंडी

बीएयू सबौर का विशेषज्ञ दल पिछले करीब डेढ़ साल से इस महत्वाकांक्षी परियोजना की रूपरेखा, पाठ्यक्रम और औद्योगिक साझेदारियों का खाका तैयार करने में जुटा था।

विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि एएसएसआइएसटी कृषि शिक्षा को व्यावहारिक, कौशल आधारित और पूरी तरह रोजगारोन्मुख बनाने में मील का पत्थर साबित होगी। उन्होंने कहा, "हमारा स्पष्ट लक्ष्य है कि हमारे विद्यार्थी जब डिग्री लेकर निकलें, तो वे नौकरी मांगने की कतार में खड़े न हों, बल्कि अपना एग्री-स्टार्टअप शुरू कर समाज के अन्य युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित करें।"

कृषि नवाचार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगी रफ्तार

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य में इस प्रकार की कौशल-संवर्धन योजना से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जबरदस्त संबल मिलेगा। टिशू कल्चर और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर नए उद्यम शुरू होने से किसानों की उपज का सही मूल्य संवर्धन (Value Addition) हो सकेगा।

बीएयू सबौर की यह पहल न केवल राज्य में एग्री-आंत्रप्रेन्योरशिप (कृषि उद्यमशीलता) का एक नया इकोसिस्टम तैयार करेगी, बल्कि बिहार के कृषि क्षेत्र में नवाचार और युवाओं की भागीदारी को भी एक नई दिशा देगी।

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