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मौसम की मार से फसल बचाएंगे BAU के वैज्ञानिक! भागलपुर में 32वीं रबी परिषद शुरू, सेंसर आधारित खाद तकनीक पर चर्चा

Published: Thu, 29 Oct 2026 05:59 AM (IST)

BAU Sabour 32nd Rabi Research Council Meeting: कृषि वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन से फसलों को बचाने और उपज बढ़ाने के लिए ...और पढ़ें

BAU Sabour 32nd Rabi Research Council Meeting: बीएयू सबौर में 32वीं रबी अनुसंधान परिषद आज से

BAU Sabour 32nd Rabi Research Council Meeting: बीएयू सबौर में 32वीं रबी अनुसंधान परिषद आज से

HighLights

  1. जलवायु परिवर्तन से फसल बचाने पर शोध।

  2. 'सबौर चना-4' सहित नई किस्मों पर चर्चा।

  3. सेंसर आधारित खेती और मशरूम प्रसंस्करण।

जागरण संवाददाता, भागलपुर। BAU Sabour 32nd Rabi Research Council Meeting: जलवायु परिवर्तन, मौसम की अनिश्चितता और बुआई में होने वाले विलंब से अन्नदाताओं की उपज प्रभावित न हो, इसके लिए कृषि वैज्ञानिकों ने उन्नत किस्मों और सटीक तकनीकों के विकास पर शोध तेज कर दिया है। इसी कड़ी में बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर के सभागार में गुरुवार (29 अक्टूबर) से रबी मौसम 2026-27 के लिए दो दिवसीय 32वीं अनुसंधान परिषद की बैठक शुरू हो रही है।

इस बैठक में रबी की प्रमुख फसलों—गेहूं, मक्का, दलहन और तिलहन की उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ रोग प्रतिरोधी और प्रतिकूल मौसम में भी भरपूर उपज देने वाली किस्मों पर गहन मंथन किया जाएगा। विशेष रूप से चना की नई प्रस्तावित उन्नत किस्म ‘सबौर चना-4’ पर वैज्ञानिकों की मुहर लगने की संभावना है।

कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह की अध्यक्षता एवं निदेशक अनुसंधान डॉ. अनिल कुमार सिंह के मार्गदर्शन में आयोजित इस उच्चस्तरीय बैठक का मुख्य उद्देश्य बिहार की विशिष्ट कृषि जलवायु (एग्रो-क्लाइमेटिक जोन) के अनुरूप किए गए शोध परिणामों की समीक्षा करना और प्रयोगशाला से निकली उपलब्धियों को सीधे किसानों के खेतों तक पहुंचाना है।

पहले दिन बायो-फोर्टिफाइड गेहूं और 'सबौर चना-4' पर चर्चा

अनुसंधान परिषद के पहले दिन का सत्र मुख्य रूप से फसल प्रजाति सुधार और आनुवंशिक विकास पर केंद्रित रहेगा। वैज्ञानिकों द्वारा गेहूं में पोषक तत्वों की प्रचुरता (जैव-संवर्धन), पीला रतुआ सहित अन्य रोगों से बचाव और देर से होने वाली बुआई के अनुकूल कम अवधि में पकने वाली किस्मों के शोध परिणाम रखे जाएंगे।

दलहनी फसलों में विशेष ध्यान आकर्षित करने वाली प्रस्तावित किस्म ‘सबौर चना-4’ पर विमर्श होगा, जिसे बिहार की जलवायु के लिए अत्यधिक उपयुक्त माना जा रहा है।

इसके अतिरिक्त मक्का में व्यावसायिक उपयोग वाले स्वीट कॉर्न और बेबी कॉर्न के उन्नत संकरों तथा मसूर, मटर और मूंग में प्रतिकूल दशाओं को सहने वाली अधिक उपजशील किस्मों के शोध पत्र प्रस्तुत किए जाएंगे। तिलहनी फसलों के अंतर्गत सरसों को सफेद रतुआ रोग से बचाने और अलसी में विल्ट (उकठा) रोग रोधी किस्मों के विकास पर मंथन होगा।

दूसरे दिन सेंसर आधारित खेती और मशरूम प्रसंस्करण पर मंथन

बैठक के दूसरे दिन शुक्रवार को मृदा स्वास्थ्य, आधुनिक कृषि यंत्र और मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) से जुड़े तकनीकी सत्र आयोजित होंगे। इसके तहत खेतों में उर्वरकों की बर्बादी रोकने के लिए सेंसर आधारित सटीक नाइट्रोजन प्रबंधन, अंतर्वर्ती (इंटरक्रॉपिंग) खेती और संतुलित रासायनिक-जैविक उर्वरक उपयोग की रूपरेखा तय की जाएगी। साथ ही दक्षिण बिहार और गंगा के मैदानी इलाकों की मिट्टी व भूजल में पाए जाने वाले आर्सेनिक एवं लौह तत्वों (आयरन) के फसलों पर प्रभाव का विश्लेषण पेश होगा।

फसल सुरक्षा सत्र में कीटों के बढ़ते कीटनाशक प्रतिरोध से निपटने के जैविक उपाय तलाशे जाएंगे। कृषि आधारित उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए फूलों को वैज्ञानिक तरीके से सुखाने, उसका चूर्ण (पाउडर) बनाने और आधुनिक पैकेजिंग मशीनों के प्रयोग पर चर्चा होगी।

वहीं, कुपोषण से निपटने और अतिरिक्त आय के लिए मशरूम पाउडर के प्रसंस्करण तथा नवीन प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के विकास की तकनीक पर मुहर लगाई जाएगी। बैठक के समापन पर चयनित किस्मों और तकनीकों को किसानों तक ले जाने की समयबद्ध रणनीति तैयार की जाएगी।

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