भागलपुर [संजय सिंह]। बांका की सियासत का अपना अलग अंदाज रहा है। यहां मौके गैर मौके दलीय सीमाएं और जातीय समीकरण दोनों टूटे हैं। दो-तीन चुनाव इसके उदाहरण रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों की मुस्तैदी बांका सीट को लेकर बढ़ गई है। एनडीए और महागठबंधन के नेताओं ने जहां यहां पूरी ताकत झोंक दी है, वहीं निर्दलीय के रूप में भी अलग कोण बनता दिख रहा है। राजद नेता तेजस्वी यादव यहां अब तक सात सभाएं कर चुके हैं। एनडीए नेता व राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी, रामविलास पासवान और केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह की सभा भी वोटों की गोलबंदी के लिए हो चुकी है। इधर भाजपा से बहार आने के बाद निर्दलीय उम्मीदवार पूर्व सांसद पुतुल कुमारी भी चुनाव मैदान में पूरे दमखम के साथ डटी हुई हैं। उनके चुनाव मैदान में आने से यह चुनाव त्रिकोणात्मक हो गया है। बांका ही एक ऐसी सीट है, जहां दो पूर्व सांसद व एक वर्तमान सांसद पुन: संसद भवन में पहुंचने के लिए जोर आजमाइश में लगे हैं।

मतदाताओं के बीच राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय मुद्दे तो हैं ही, स्थानीय फैक्टर भी हैं। स्थानीय मुद्दे भी उठ रहे हैं। उनका कहना है कि रेलवे की कई योजनाएं लंबित हैं। मेगा अल्ट्रा पावर प्लांट और चांदन-बेलहरना जलाशय योजना का काम अधूरा पड़ा है। बांका को औद्योगिक विकास के मानचित्र पर लाने के लिए जन प्रतिनिधियों ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। पुल और पुलिया का निर्माण जरूर हुआ है। सड़कें फिर जर्जर होती जा रहीं हैं। विकास के नाम पर भी भेदभाव का गुणा गणित मतदाता इसी चुनाव में करने को आतुर हैं।

जदयू के गिरधारी यादव इस सीट से दो बार सांसद रह चुके हैं। वर्तमान में वे बेलहर के विधायक हैं। राजद प्रत्याशी जयप्रकाश नारायण यादव 2014 में भाजपा की पुतुल कुमारी को पराजित कर सांसद चुने गये थे। उन्हें केंद्र और राज्य में मंत्री होने का भी अनुभव प्राप्त है। गिरधारी को मोदी मैजिक पर पूरा भरोसा है। वे तमाम समीकरणों को अपने पक्ष में मानते हैं, लेकिन राजद के माई समीकरण को तोड़ पाने की कड़ी चुनौती है। गिरधारी के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस समीकरण में सेंधमारी की होगी। हालांकि धोरैया के जदयू विधायक मनीष कुमार और बांका के विधायक व राज्य सरकार के मंत्री राम नारायण मंडल और भाजपा नेता मृणाल शेखर एनडीए प्रत्याशी के लिए कोई मौका नहीं छोडऩा चाहते हैं, लेकिन दल से ही जुड़े कुछ लोगों का दिल एनडीए प्रत्याशी को लेकर साफ नहीं है। कटोरिया के पूर्व विधायक पप्पू यादव भी झारखंड मुक्ति मोर्चा से चुनाव मैदान में हैं। एक ही समाज के तीन प्रत्याशियों के रहने के कारण वोट बिखराव संभव है। इधर पुतुल कुमारी स्वयं सांसद रहीं हैं। इनके पति दिग्विजय सिंह भी तीन बार बांका का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। बांका को रेल के मानचित्र पर लाने में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है। उनकी लोकप्रियता को भुनाने में पुतुल भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहीं हैं। अपनी मां के चुनाव प्रचार की कमान राष्ट्रीय शूटर श्रेयसी सिंह और मानसी सिंह संभाल रहीं हैं। दो-तीन दिनों से भाजपा से अलग हुई रेणु कुशवाहा भी पुतुल के प्रचार में जुटी हैं। यहां के चुनाव मैदान में 20 प्रत्याशी हैं। बहरहाल, यहां चुनावी परिदृश्य काफी रोचक बनता जा रहा है।

राष्ट्रहित सर्वोपरि

भागलपुर के सुल्तानगंज विधानसभा क्षेत्र के मतदाता इस चुनाव में सक्रिय हैं। इस इलाके के विजय चौरसिया का कहना है कि राष्ट्रवाद और देश का स्वाभिमान इस चुनाव का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा है, वहीं मसदी गांव के विजय झा का कहना है कि पिछले पांच साल के दौरान एक भी बड़ा काम सुल्तानगंज विधानसभा क्षेत्र में नहीं हुआ। केंद्रीय योजनाओं का लाभ लोगों को जरूर मिला है। शंभूगंज के राकेश सिंह, नरेश सिंह, गोविंद सिंह आदि का कहना है कि यह लड़ाई स्वाभिमान की है। मतदाता तीनों प्रत्याशियों को अपनी कसौटी पर कस कर ही अपना वोट देंगे।

गरीबों का भला कर रही है सरकार

इससे अलग अमरपुर के रामेश्वर तूरी का विचार है। उनका कहना है कि गरीबों को गैस कनेक्शन दिया गया। गंभीर बीमारी से इलाज की सुविधा दी गई है। अब उनपर कोई अत्याचार नहीं करता। उधर इंग्लिश मोड़ निवासी मनोज सिंह का कहना है कि नेता भले ही वोट मांगने आते हैं पर पांच साल की उपलब्धि पूछे जाने पर उनके पास संतुष्ट करने लायक कोई जवाब नहीं होता। सरकार भले ही यह नारा देती हो सबका साथ सबका विकास, लेकिन चुनाव जीतने के बाद नेता इन बातों को भूल जाते है। बेलहर के रामबदन यादव का कहना है की मोदी ने जो काम किया है उसकी चर्चा तो हर घर में है, लेकिन वह अपना वोट सोच समझ कर ही देंगे।

जातीय समीकरण सब पर हावी

ढाका मोड़ बांका की राजनीति की चर्चा का एक प्रमुख केंद्र है। यहां हर इलाके के लोगों को कहीं आने-जाने के लिए वाहनों की तलाश में आना ही पड़ता है। यहां दिवाकर झा, आनंदी झा, बलराम झा बताते हैं कि राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय मुद्दे के अलावा यहां के चुनाव में जातीय फैक्टर भी काम कर रहा है। व्यवसायी परशुराम साह, आनंदी साह का कहना है कि देश का मुद्दा देखना होगा। श्याम बाजार में मिले राजेश साह कहते हैं कि उनके पड़ोस में झारखंड का गोड्डा है। वहां की स्थिति देखकर ही हमलोग निर्णय लेंगे। यहीं मिले प्रसादी यादव, राम प्रसाद यादव, वकील यादव का सीधा कहना है कि समाजिक न्याय के राजनीतिक अस्तित्व को समाप्त करने की साजिश रची जा रही है। हमलोग इस साजिश का डटकर मुकाबला करेंगे। इसी की वजह से गरीब गुरबों को जुबान मिली है। बराहाट में मिले मु.करीम का कहना है कि अभी कुछ तय नहीं है। लेकिन जिधर देश के अल्पसंख्यक जाएंगे, उधर ही यहां के मुस्लिम जाएंगे। कुल मिलाकर यहां का सत्ता संघर्ष त्रिकोणात्मक दिख रहा है। यहां चुनाव लड़ रहे नेताओं को उस जमात को संभालने की कड़ी चुनौती है, जिसके बल पर वे संसद भवन की यात्रा करना चाहते हैं।

चुनावी आंकड़ो पर एक नजर

कुल मतदाता : 16,87,920

पुरूष - 8,96,329

महिला - 7,91,551

थर्ड जेंडर - 20

Posted By: Dilip Shukla

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